दिये गये गद्यांश को पढ़िए और प्रश्न का उत्तर दीजिए:
वर्ष 1991 में, ली डब्ल्यू फिन्क्स ने पुस्तकालय अध्यक्ष पद के लिए एक नई नैतिक विषयक संहिता विकसित करने की आवश्यकता के बारे में लिखा। वर्ष 1995 में ए एल ए ने भी वही लिखा। संहिता के आवलोकन पश्चात आप इस निष्कर्ष पर पहुंचाते हैं कि शायद उनके सभी सरोकारों को इसमें समाविष्ट नहीं किया गया। फिंक के शोध - प्रबंध हेतु अत्यावश्यक वह विश्वास है कि पुस्तकालय अध्यक्षों और सूचना पेशेवरों के लिए एक नैतिक संहिता को लोगों अथवा पुस्तकालय बोडों को संतुष्ट करने वाला कोई निरर्थक कथन नहीं होना चाहिए। यह अवश्य रूप में ऐसे सिद्धांतों और संप्रत्ययों को सम्मिलित करता है कि पुस्तकालय अध्यक्ष ऐतिहासिक रूप में मूल्यवान समझे जाते हैं ओर "इसे हमारे कार्य करने के तरीके पर केन्द्रित होना चाहिए और चाहे उस तरीके से कार्य करें अथवा नहीं करें जिसे ईमानादाव से पेशेवर कहा जा सके"। इसके अतिरिक्त जोहान बेक्केर ने जैसा कि इंगित किया है कि जब से समाज किसी व्यवसाय (पेशे) को इसके वैयक्तिक सदस्यों से आँकने लगा है, सभी सदस्यों को नैतिक मानदण्डों के स्पष्ट रूप से परिभाषित समुच्चय का अवश्य ही अनुकरण करना चाहिए। विशेषतया, सामग्रियों और बौद्धिक स्वतंत्रता के चयन से संबंधित नैतिक मुद्दों को पुस्तकालय अध्यक्ष द्वारा सावधानी पूर्वक विचार किया जाना चाहिए। बौद्धिक स्वतंत्रता इस पूर्व धारणा पर निर्भर करती है कि कोई व्यक्ति किस दिशा में जाँच (पता) करते हैं, किन्तु यह अक्सर गलत पूर्वधारणा है। व्यावसायिक संहिताएँ पुस्तकालय अध्यक्ष से निष्पक्ष रहने और किसी ग्राहक के आग्रह (निवेदन) पर सूचना प्रदान करने की माँग करती है। पुस्तकालय अध्यक्षों को इस बात को सुनिश्चित करने केलिए अपनी पूर्व अवधारणाओं ओर पूर्वाग्रहों से बचना चाहिए कि वे पुस्तकालय अध्यक्ष पद में अन्तर्निहित होने वाले उन मूलभूत सिद्धांतों को नष्ट नहीं करेंगे। सभी परिप्रेक्ष्यों तक पहुँच की अनुमति देना सामाजिक दायित्व है।