परिच्छेद को पढ़िए और परिच्छेद पर आधरित प्रश्न के उत्तर दीजिए।
भारत में विश्व के कुल भू-भाग का महज़ 3% भू-भाग है तथा वैश्विक जल संसाधन का महज़ 5 फीसदी। जबकि भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा खाद्य उत्पादक है, और फल तथा सब्जियों के उत्पादन में इसे दूसरा स्थान प्राप्त है। वही इसके विरोधामास में, भारतीय चिकित्सा परिषद के वर्ष 2015 के रिपोर्ट में यह बताया गया है कि भारत को 12-13% आबादी पैष्टिक भोजन के अभाव में काल का ग्रास बन जाती है, और 25% भारतीय भूखे पेट सोते हैं। भारत में ऐसी विसंगति क्यों है ? इसके लिए उत्तरदायी कारणों को व्यापक रूप से तीन भागों में बांटा गया है। पहला, ऐसे फसलों का उत्पादन जो पोषण की जरूरतों को पूरा नहीं करते (पोषण संबंधी अनुपलब्धता) दूसरा, पौष्टिक भोजन गरीबों की पहुँच से बाहर है (उनका महंगा होना) और तीसरा, कमजोर आपूर्ति व्यवस्था तथा सरकारी हस्तक्षेप का विफल होना जो अभी भी वंचित तबके को खाद्य के अधिकार से वंचित रखता है (पोषण तक पहुँच न होना)। हमारे खाद्य उत्पादन ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के अंतर्गत एक-तिहाई आबादी को पर्याप्त अनाज मुहैया कराने की क्षमता हासिल कर ली है। लेकिन पोषण सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए, हमें, कृषि के विद्यमान तरीकों पर ध्यान देना होगा। हमें पैदावार के तरीकों में बदलाव कर अनाज से पोषण आधारित पैदावार का रूख करना पड़ेगा जिसमें उद्यान-उत्पाद, अपरिष्कृत अनाज, दलहन और मोटे अनाज को बढ़ावा दिया जाए। राष्ट्रीय बागवानी मिशन (एन एच एम) के अंतर्गत पिछले कुछ वर्षों के दौरान बागवानी उत्पादन दोगुना हुआ है। प्रत्येक भारतीय को प्रतिदिन 2455 किलो कैलोरी उपलब्ध है जो यूरोपीय देशों की 3000 किलो कैलोरी की तुलना में काफ़ी कम है। एफ ए ओ/डब्ल्यू एच ओ के अनुसार प्रतिदिन कम से कम 400 ग्राम फल और सब्जियां खायी जाने चाहिए। भारतीयों को दैनिक उपभोग का आधा हिस्सा भी नहीं मिल पाता है।
सरकार को गुणत्तापूर्ण चीजों, समेकित कीटनाशी एवं रोग प्रबंधन के माध्यम से घरेलू पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करना चाहिए। शहरी इलाकों के इर्द-गिर्द सब्जियां उगाने तथा छत पर बागवानी को, तथा विद्यालय परिसर में सब्जियों को उगाने हेतृ बढ़ावा दिया जाना चाहिये, जिससे फल व हरी सब्जी के बढ़े हुए उत्पादन का व्यापक प्रभाव पोषण पर पड़ेगा। दलहन के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य में की गई हालिया बढ़ोत्तरी तथा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन में इसे लाए जाना एक स्वागतयोग्य कदम है। जैविक खेती को एक वैकल्पिक बेहतर खेती के रूप में आगे बढ़ाया जाना चाहिए। चूंकि पोषक तत्व वाले खाद्य मंहगे हैं अतः खाद्य को संपोषित किए जाने से यह गरीबों तक पहुँच पाएगा। पौष्टिक भोजन की अनुपलब्धता से जीवन की गुणवत्ता प्रभावित होती है, उत्पादकता में कमी आती है, सही मानसिक विकास नहीं हो पाता, स्वास्थ्य देखरेख की लागत बढ़ जाती है और स्कूल जा पाने के दिनों में गिरावट होती है। जनसांख्यिकीय खाई जनसांख्यिकीय बोझ में तब्दील हो रही है।