निम्नलिखित गद्यांश को सावधानीपूर्वक पढ़िए और इसके आधार पर दिए गए प्रश्न का उत्तर दीजिए
प्राचीन समाजशास्त्रियों के चिंतन में इस अवधारणा की प्रधानता थी कि किस प्रकार मनुष्य तथा समाज के विकास के सुनिश्चित चरणों को पार कर व अधिकतम जटिलता से गुजरकर पूर्णता के अंतिम चरण में पहुंच रहे हैं। समाज के सामान्य विकासवादी मॉडल का निरूपण अनेक विशिष्ट सिद्धांतों में किया गया है। उदाहरण के लिए काम्टे ने तीन चरणों का वर्णन किया है जिनके माध्यम से भी समाज को गुजरना ही चाहिए। वे तीन चरण हैं - विजय, सुरक्षा तथा उद्योग। उन्होंने प्रत्येक के लिए मनुष्य की सोच को विकास में समांतर चरण को निरूपित किया है जिसकी उन्होंने कल्पना की थी कि यह पार-लौकिक के माध्यम से होकर तात्विक से निर्मित हो रहा है और यह अन्तत: काम्टे के अपने प्रत्याक्षात्मक दर्शन तक पहुँचता है। यद्यपि स्पेंसर की विकास संबंधी रूपरेखा कम भव्य थी, तथापि उनकी यह धारणा थी कि समाजशास्त्र "सर्वाधिक जटिल रूप में विकास का अध्ययन है।"
विकासवादी मॉडल में समाज को ऐसा माना गया मानो मनुष्य के सामाजिक विकास में काफी कुछ अंतर्निहित है जिसके लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक चरण बारी बारी से प्रस्तुत हो ताकि "प्राकृतिक नियम" के अनुसार यह अपनी भूमिका निभा सके। स्पष्ट है कि इस अवधारणा से सामाजिक दार्शनिकों को विकासवाद के सिद्धान्त को हथियाने तथा इसका उपयोग अपनी राजनीतिक स्थिति में इसे सहायक बनाने का लोभ संवरण नही कर पाये। उदाहरण के लिए, अमेरीकी समाजशास्त्री विलियम ग्राहम समनर ने सुविधावंचित व्यक्तियों पर सुविधाप्राप्त व्यक्तियों के विशेषाधिकार को इस आधार पर न्यायोचित बताया कि यह विभेद योग्यतम की उत्तरजीविता के सिद्धान्त के अनुसार प्रकृति का नियम है। समनर, जिसे "सामाजिक डार्विनवाद" की संज्ञा दी गई है, ने स्पेंसर की तरह विकास के विचार का उपयोग सुधार एवं सामाजिक परिवर्तन के प्रयास को यह तर्क देते हुए अवसद्ध किया कि सामाजिक विकास को प्रकृति द्वारा बताये गये मार्ग पर चलना चाहिए। उन्होंने बताया "यही कारण है कि सबसे बड़ी भूल, जो मनुष्य से हो सकती है, वह है, बैठकर स्लेट और पेंसिल हाथ में पकड़े और एक नवीन सामाजिक संसार की योजना बनायें।"