Comprehension Passage
मिर्डाल की सामाजिक परिवर्तन और विकास के सिद्धांत, प्रसिद्ध स्थिति चक्रीय कारण और संचयी परिवर्तन से संबंधित है। वे विकास की सार्वभौमिक उद्विकासात्मक अवस्थाओं के निर्माण करने की वैधता पर संदेह करते हैं। उनके अनुसार उनमें अक्सर उद्देश्यमूलक और रूढ़िवादी वैचारिकी छिपी होती है। इसके सभी घटक स्थितियों वाले एक समग्र रूप में सामाजिक व्यवस्था के एक उपरिगामी आंदोलन, विकास में अति - महत्त्वपूर्ण कारक हैं। मिर्डाल द्वारा दक्षिण एशियाई देशों के लिए वर्णित यह स्थितियाँ हैं: (1) निर्गत और आय (2) उत्पादन की स्थितियाँ (3) जीवन - स्तर (4) जीवन और कार्य के प्रति अभिवृत्तियाँ (5) संस्थाएँ (6) नीतियाँ। वे इन दशाओं के मध्य एक - दिशीय कार्य-कारण संबंध देखते है, दिए गए परिस्थितियों में ऊर्ध्वगामी अथवा अधोगामी आंदोलन के कारण अन्य परिस्थितियों में समान प्रकृति के संचयी आंदोलन होंगे। इन परिस्थितियों से संबंधित मूल्य सिद्धांत एक देश और दूसरे देश में भिन्न हो सकते हैं- विशेषकर साधन-मूल्यों और स्वतंत्र-मूल्यों में, जहां स्वतंत्र मूल्य अपने आप में लक्ष्य के रूप में भी समझे जा सकते हैं। ये मूल्यांकन प्रत्येक राष्ट्रीय समाज में विकास के वैचारिक संदर्भ को परिभाषित करते हैं, लेकिन समग्र रूप में सामजिक व्यवस्था के गुणों वाले सावयवी रूप से चयनित तरीके से जुड़े हैं। मिर्डाल के अनुसार भारत और अन्य दक्षिण एशियाई देशों में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया चरमोत्कर्ष की तेजी से बढ़ती है, और तर्क संगत विकल्य के लिए समय उन के लिए सीमित है। एक क्रमिक वादी उपागम के लिए अवसर भी समाप्त हो गया है। मिर्डाल का मानना ​​है कि तीव्र ढंग से बड़ा परिवर्तन, क्रमिक रूप से छोटा परिवर्तन करने की अपेक्षा अधिक कठिन नहीं बल्कि और भी आसान है। इस प्रकार के बड़े तीव्र परिवर्तन भारतीय समाज में सामाजिक और सांस्थानिक दशाएं हैं। ये परिस्थितियाँ (उपर्युक्त 4 और 5 ) विकास के सभी अन्य परिस्थितियों को गतिशील बनाए रखने की मुख्य कुंजी है।

विकास के सार्वभौमिक उद्विकासात्मक अवस्थाओं के निर्माण होने में निम्न शामिल हो सकता है:

1
उद्देश्यमूलक वैचारिकी
2
रूढ़िवादी वैचारिकी
3
उपरोक्त दोनों
4
उपरोक्त में से कोई नहीं

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