नीचे दिए गए गद्यांश को ध्यान पूर्वक पढ़िए और प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
ग्रामीण जाति की एक मुख्य विशेषता यह है कि गांव में रहने वाले विभिन्न जाति-वर्गों के लोग एक साथ मिलकर स्थानीय स्तर पर आवश्यक खाद्यान्न तथा अन्य वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन करते हैं। दूसरे शब्दों में, ग्राम स्तर पर जाति व्यवस्था उत्पादन व्यवस्था और विलोमतः रूप में अभिबंधित होता है। अतः भूस्वामी के परिवार का लुहार, बढ़ई, कुम्हार, तेली, नाई, धोबी पुजारी तथा काश्तकार/आसामी या श्रमिकों के विशेष परिवारों के साथ दीर्घकालिक सहजीवी संबंध होता है। इसका प्रतीकार्थ जजमानी व्यवस्था है जिसमें भूस्वामी द्वारा उन शिल्पकारों, दस्तकारों, घरेलू श्रमिकों, सेवा प्रदातओ, मुखियाओं को फसल कटाई के बाद भूसा पूआल सहित अनाज की विशिष्ट मात्राएं प्रदान की जाती हैं जिन्होंने पिछले कृषि वर्ष के दौरान कार्य किया था। परंपराग रूप से ये दरें लंबे समय तक स्थिर बनी रहेती थीं और भूस्वामी से तब तक अपने कामगारों को अपने पास रखने की अपेक्षा होती थी जब तक कि वे अपने कार्य में सतत रूप से कोई गलती न किए हों और इसके बदले, कामगार भी किसी गंभीर कारण के बिना अपने मालिकों को बदल नहीं सकते थे। वस्तुतः संगरक्षक-ग्राहक और मालिक - नौकर के संबंध वंशानुगत होते थे, एक भूस्वामी को विरासत में प्राप्त होते है क्योंकि वे उसके खेतों में कार्य करने हेतु कुशल कामगार समुदाय था जिसे कालांतर में विरासत में प्राप्त होता था। ग्राम में अंतर-जाति और अंतर- पारिवारिक संबंध दीर्घ-जीवी तथा असहाय तथा घनाभाव बहुस समस्याओं से ग्रस्त होते थे।