निम्नलिखित गद्यांश को सावधानी से पढ़िये और प्रश्नों के उत्तर दीजिये:
मानव समाज में व्यक्तियों, सामानों एवं सूचना का संचरण सदैव एक मौलिक संघटक रहा है। समकालीन आर्थिक प्रक्रियाओं के साथ गतिशीलता एवं अभिगम्यता में सार्थक वृद्धि हुई है। यद्यपि यह प्रवृति औद्योगिक क्रांति से पूर्व भी थी, तथापि इसमें 20वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में पर्याप्त बढ़ोत्तरी हुई क्योंकि व्यापार का उदारीकरण हो गया, आर्थिक ब्लाक उभर कर आए और वैश्विक श्रम एवं संसाधनों के तुलनात्मक लाभों को अधिक दक्षता से प्रयोग किया गया । विभिन्न प्रकार के कार्यकलापों में से आवागमन, ऊर्जा आवश्यकता की आपूर्ति, विनिर्माण सुविधाओं एवं वितरण केन्द्रों के मध्य वितरण के लिए समाज की अपने परिवहन प्रणालियों पर निर्भरता निरंतर बढ़ती रही है । परिवहन का विशिष्ट उद्देश्य दूरी को कम करना है, जो अनेक मानवीय एवं भौतिक अवरोधों जैसे दूरी, समय प्रशासनिक प्रभागों एवं स्थलाकृतियों से निर्धारित होती है। संयुक्त रूप से, वे किसी संचलन में बाधाप्रस्तुत करते हैं जिसे सामान्य रूप में दूरी के संघर्ष के रूप में जाना जाता है । बिना भूगोल के कोई यातायात नहीं हो सकता है और बिना यातायात के कोई भूगोल नहीं हो सकता है । इस प्रकार यातायात का लक्ष्य माल-भाड़े, व्यक्तियों अथवा सूचना, उत्पत्ति से गंतव्य की भौगोलिक गुणों के रूपान्तरण और इस प्रक्रिया में उनमें मूल्यवर्धन करना है, यह जिस सुगमता से किया जा सकता है, उस "परिवहनीयता" में प्रचुर विविधता पायी जाती है । परिवहनीयता का संदर्भ यात्रियों, माल-भाड़े अथवा सूचना के परिवहन में सुगमता है । यह परिवहन लागत के साथ-साथ परिवहन किए जा रही वस्तुओं के गुणों (क्षण-भंगुरता, नाशवान मूल्य) से प्रभावित होती है, राजनीतिक पहलू जैसे कानून, विनियम, सीमाएँ एवं शुल्क भी परिवहनीयता को प्रभावित करते हैं । परिवहन का विशिष्ट उद्देश्य गतिशीलता की मांग को पूरी करना है, चूंकि परिवहन तभी रहेगा जब व्यक्तियों माल-भाड़े एवं सूचना में गतिशीलता बनी रहे। अन्यथा इसका कोई उद्देश्य नहीं है। यह इसलिए है, कि परिवहन मुख्यत: एक व्युत्पन्न मांग का परिणाम है।