बागवानी उत्पादों में अंगूर, आम, संतरे, केले और सेब आदि अधिक निर्यात संभावित उत्पाद हैं। महाराष्ट्र से खाड़ी देशों के लिए अंगूर का निर्यात एक उत्साहजनक विशेषता प्रवृत्ति है। अधिकांश बागवानी उत्पादों के सम्मुख मुख्य समस्या फसल पकने के समय उत्पाद की अधिकता है। इन उत्पादों की संरक्षण संबंधी प्रौद्योगिकी और विपणन/उपभोक्ता केंद्रो तक उनकी शीघ्र सुपुर्दगी की आवश्यकता है। वस्तुतः बागवानी हेतु कृषि योजना में सरकार से बेहतर कार्य की अपेक्षा है। ब्राजील और अमेरिका के बाद भारत विश्व में तीसरा बड़ा फल उत्पादक देश है, परंतु यह अपने कुल उत्पादन के मात्र 0.5 प्रतिशत भाग का प्रसंस्करण करता है जबकि ब्राजिल 70 प्रतिशत भाग का प्रसंस्करण करता है और इस कारण रु. 3000 करोड़ के फल और सब्जियां बर्बाद हो जाती है। अंतः उनमें कवकों से प्राकृतिक प्रतिरक्षा संबंधित आनुवांशिक अभियांत्रिकी के प्रयोग द्वारा इसे रोका जा सकता है। काइटिनेस जीन को टमाटर, आलू, सलाद-पत्ता (लेट्यूस) और अन्य पौधों में अतर्वेशित करके उनकी ताज़गी बाजारों तक पहुँचने तक सुनिश्चित की जाती है और धूम्रीकरण पर होने वाले लाखों रुपए के व्यय की बचत की जाती है।
राघवन (1992) ने आबादी की पोष्टिकता जरूरतों की पूर्ति हेतु फल उत्पादन में 50 प्रतिशत और सब्जी में 100 प्रतिशत की वृद्धि करने का सुझाव दिया है। इसके अतिरिक्त 3 मिलियन हेक्टेयर सिंचित भूमि में 2000 मॉडल बागवानी उत्पादन एवं प्रसंस्करण केंद्रों की स्थापना के द्वारा 25% अतिरिक्त निर्यात की वृद्धि के लक्ष्य को पूरा करना होगा। इससे तीन मिलियन किसानों को उत्पादन में 18,000 रूपए प्रति हेक्टेयर का लाभ होगा और पूरे वर्ष इतनी ही संख्या में रोजगार सृजित होगे और कुल छः मिलियन परिवार गरीबी रेखा से बाहर आएंगे।