दिए गए गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए एवं निम्नलिखित प्रश्न का उत्तर दीजिए।
क्षोभमंडल में ऊपर की ओर क्षोभसीमा तक तापमान के कम होने की औसत दर लगभग 6°C प्रति किलोमीटर है। तापमान की इस ऊर्ध्वाधर प्रवणता को सामान्यतः सामान्य ह्रास दर कहा जाता है।
निचले क्षोभमंडल में कतिपय प्रक्रियाएँ ऊँचाई के साथ तापमान में वास्तविक वृद्धि करती है, वह तापमान का व्युत्क्रमण है। तापमान व्युत्क्रमण पाँच तरीकों से उत्पन्न हो सकते हैं।
(1) जब पृथ्वी की सतह ऊर्जा स्थानांतरण के किन्हीं प्रक्रमों द्वारा प्राप्त ऊष्मा की तुलना में विकिरण द्वारा ऊष्मा की हानि अधिक करती है, जैसे- एक स्वच्छ रात में या शीत ऋतु में उच्च अक्षाशों पर, यह ठंडी होती जाती है तथा परिणामस्वरुप संलग्न वायु की परत का तापमान कम करती है। विकिरणात्मक शीतलन के कारण व्युत्क्रमण (विकिरण व्युत्क्रमण) शांत वायु स्वच्छ आकाश की दशा में समतल भूभाग पर सर्वोत्तम विकसित होते हैं।
(2) ठंडी तथा सघन वायु गिरि-शिखरों तथा ढालों से ढाल के साथ नीचे की ओर प्रवाहित होकर घाटी तलहटियों में एकत्रित होती है। यह घाटी तल के ऊपर मुक्त वायु में व्युत्क्रमण ह्रास दर उत्पन्न करती है। वायु अपवाह व्युत्क्रमण प्रायः मध्य अक्षाशों में बसंत ऋतु के पालों से संबंधित होते हैं, एवं इसी कारण फल उत्पादक फलोधान-स्थल हेतु घाटी तलहटियों की अतिरिक्त मंद ढालों को वरीयता देते हैं।
(3) जब भिन्न तापमान विशेषताओं वाली दो वायुराशियाँ आपस में मिलती है, तब ठंडी वायु अधिक घनत्व के कारण गर्म वायु को नीचे से धकेलते हुए उसे प्रतिस्थापित करती है। दो वायु राशियों के मिलन सीमा क्षेत्रों को वाताग्र कहते हैं तथा व्युत्क्रमित हास दर फलस्वरुप वाताग्र व्युत्क्रमण होता है। वाताग्र व्युत्क्रमण क्षोभमंडल की निचली परतों तक सीमित नहीं होते हैं। वे ऊपरी स्तरों में जब भी ठंडी वायु गर्म वायु के नीचे प्रवेश या गर्म वायु का ठंडी वायु के ऊपर आगे बढ़ने से निर्मित हो सकते हैं।
(4) गर्म वायु के ठंडे धरातल पर अभिवहन से वायु राशि की निचली परतों में व्युत्क्रमण निर्मित होता है क्योंकि गर्म वायु संचालन द्वारा ठंडी होती है।
(5) जब एक विस्तृत वायु अवतलित होती है एवं नीचे को परत पर फैल जाती है तब एक वायु राशि में अवतलन व्युत्क्रमण विकसित होता है। इस प्रक्रिया में वायु आधार की तुलना में ऊपरी भाग में गतिशीलता प्रभाव से अधिक गर्म हो जाती है। इस प्रकार के व्युत्क्रमणों का विकास काफी ऊँचाइयों पर होता है।