Comprehension Passage

बुद्ध ने राजनीति को स्वयं में एक साध्य के रूप में नहीं देखा, बल्कि एक ऐसे उपकरण साधन के रूप में देखा जो किसी व्यक्ति की निजी उन्नति के लिए या तो अनुकूल परिस्थितियाँ उपलब्ध करा सकती है या हानिप्रद अवरोध उत्पन्न कर सकती है। उनकी मान्यता थी कि सामाजिक व्यवस्था और कल्याण उपलब्ध कराने के लिए सरकार आवश्यक है और इसके मूल्यों, अर्न्तवस्तु और प्रक्रियाओं को 'धर्म' के साथ सुसंगत होना चाहिए। यहाँ धर्म का तात्पर्य बुद्ध की शिक्षाओं और उनके कार्यान्वयन से है जिन्हें सार्वभौम या प्राकृतिक नियमों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

इन नियमों की रचना बुद्ध ने नहीं की। ये बुद्ध के होने या न होने से निरपेक्ष हैं। लेकिन बुद्ध ने इन नियमों को उद्घाटित किया और यह अनुशंसा की हम, अंधे विश्वास से नहीं बल्कि तार्किक मानवीय आकलन के माध्यम से उन नियमों की पड़ताल करें और उनके अनुसार कार्य करें। धर्म का राजनीति के लिए प्रासंगिक एक मूलभूत सिद्धान्त है - सभी व्यक्तियों की समानता और सम्मान । बुद्ध ने इस बात पर जोर दिया कि सभी मनुष्यों में एक अन्तर्निष्ठ योग्यता और प्रबोधन की क्षमता होती है. जिसे 'बुद्ध-प्रकृति' कहा गया। उस समय प्रचलित कर्मकांड आधारित शिक्षाओं के विपरीत बुद्ध ने जाति-व्यवस्था को अस्वीकार किया और तर्क दिया कि पूरे समाज में सदगुणों का वितरण समान ढंग से हुआ है, श्रेणीबंध ढंग से नहीं। बुद्ध की शिक्षाओं में समानता का सिद्धान्त तब भी प्रतिबिम्बित होता है जब वह बताते हैं कि राजतंत्र, अपने जीवनकाल में, किसी दैवीय अधिकार पर नहीं बल्कि लोकप्रिय सहमति पर आधारित होना चाहिए, उसका संचालन शासितों के परामर्श के साथ होना चाहिए, उसे न्याय के क्रियान्वयन में निष्पक्ष होना चाहिए और धर्म के अनुसार चलना चाहिए। बुद्ध के अपने राजनैतिक सृजन, संघ में प्रवेश, भागीदारी, प्रशासन और विवादों के समाधान सम्बन्धी नियम कठोर समानता के सिद्धान्त से निर्देशित होते थे।

नीचे दो कथन दिए गए हैं:

कथन I : बुद्ध सरकार के लिए लोकप्रिय सहमति में विश्वास करते थे।

कथन II : बुद्ध कहते हैं कि लोगों के दैवीय अधिकार होते हैं।

उपरोक्त कथन के आलोक में, नीचे दिए गए विकल्पों में से सबसे उपयुक्त उत्तर का चयन कीजिए: 

1
कथन I और कथन II दोनों सही हैं।
2
कथन I और कथन II दोनों गलत हैं।
3
कथन I सही है, लेकिन कथन II गलत है।
4
कथन I गलत है लेकिन कथन II सही है।

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