Comprehension Passage

पाठबोध:

स्वतंत्रता के बाद भूमि-सुधार मोटे तौर पर कुमारप्पा समिति के आधार पर अपनाये गये। इस समिति ने शोषण को खत्म करने और जोतने वाले को भूमि देने को अपना मार्गदर्शक सिद्धांत माना। बिहार प्रदेश किसान सभा (BPKS) की स्थापना 1929 में हुई थी। इसने 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) के रूप में राष्ट्रीय उपस्थिति स्थापित की। स्वामी सहजानंद सरस्वती ने प्रांतीय संगठनों पर अपना दबदबा बनाया और भारत में सबसे बड़े किसान नेता के रूप में उभरे और 1935 में BPKS के अध्यक्ष भी बने। 1937 में बिहार में कांग्रेस मंत्रिमंडल के गठन ने दोनों संगठनों के बीच टकराव की प्रक्रिया को तेज कर दिया। जमींदारों ने काश्तकारों की स्थिति सुधारने के लिए काश्तकारी कानून पारित करने में अपनी मदद और सहयोग की पेशकश की। बिहार सहित उत्तर-औपनिवेशिक भारत ने राजनीतिक व्यवस्था में कांग्रेस के प्रमुख दल के रूप में उभरने को देखा। 1952 के चुनावों में झारखंड पार्टी राज्य विधानमंडल के अंदर मुख्य विपक्षी दल थी। बिहार में 1952 के आम चुनावों के महत्वपूर्ण परिणाम दो क्षेत्रीय राजनीतिक दलों, झारखंड पार्टी और जनता पार्टी का उदय थे। जनता पार्टी की स्थापना 1950 में राजा कामाख्या नारायण सिंह ने कांग्रेस के खिलाफ पारंपरिक विपक्ष बनाने के लिए की थी। इसका राजनीतिक प्रभाव मुख्य रूप से दक्षिण बिहार तक ही सीमित था। 1967 तक, बिहार में एक पार्टी के प्रभुत्व वाली प्रणाली यानी रजनी कोठारी द्वारा परिकल्पित 'कांग्रेस प्रणाली' देखी गई। 1967-69 के बीच, चुनावों में अत्यधिक विभाजित बहुदलीय प्रणाली देखी गई। कांग्रेस की चुनावी ताकत में गिरावट से एक तरफ समाजवादियों और कम्युनिस्टों को फायदा हुआ, तो दूसरी तरफ जनसंघ को।

अनुच्छेद के अनुसार, 1935 में बिहार प्रदेश किसान सभा का नेतृत्व किसने किया था?

1
राजेंद्र प्रसाद
2
स्वामी सहजानंद सरस्वती
3
दरोगा प्रसाद राय
4
रामजीवन सिंह

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