निम्नलिखित गद्यांश को पढ़ें और इसके प्रश्न का उत्तर दीजिए ।
भारत में लोक नीति परिवर्तन की स्थिति में है। विभिन्न कर्ताओं स्थानीय और वैश्विक रूप से दोनों की बढ़ती भूमिका के साथ नीतिगत प्रक्रियाओं के में स्वरूप में नाटकीय परिवर्तन आया है। उन बहुविध विचारों पर ध्यान देने की पैरवी की जाती है, जिनका शासन प्रक्रियाओं में अभ्युदय हो रहा है, यह तर्क दिया जाता है कि सिविल सोसायटी और नागरिकों के बीच संवाद के लिए गुंजाइश उत्पन्न करना आवश्यक है। शोध और नीति के बीच अधिक मजबूत संबंधों की मांग उतनी ही बढ़ती गई है, जितनी कि नौकरशाही को पेशेवर बनाने के लिए लोक नीति की शिक्षा को मुख्यधारा में लाने की मांग की जा रही है।
नए विमर्शो का अभ्युदय हुआ है, जो नीतिगत विकल्पों को आकार देते हैं। फिर भी, अनेक विमर्श शब्दाडंबर और दिखावे तक सीमित रह गए हैं। राष्ट्रीय स्तर पर शहरीकरण जैसी जनांनिकीय प्रवृत्तियों और वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन जैसी प्रवृत्तियों के अभ्युदय ने लोक नीति और शासन की रूपरेखाओं को पुनर्परिभाषित किया है, जिसने नीति निरूपण के साथ-साथ शासन के उपयुक्त रूपों पर बहस को जन्म दिया है। शासन, संसाधनों के आवंटन में नियंत्रण और प्राधिकार के इस्तेमाल के समस्त तरीकों को संदर्भित करता है। इस प्रकार, शासन के मुद्दे उन प्रक्रियाओं और तंत्रों के साथ नज़दीकी से जुड़े होते हैं, जिनके माध्यम से जनता संसाधनों तक पहुंच कायम करती है। इसके बावजूद इन्होंने संसाधनों के उपयोगकर्ताओं पर नियंत्रण में किस सीमा तक सुधार किया है, यह प्रश्न विवादास्पद है। यह प्रायः राज्य और सिविल सोसायटी के बीच संबंधों के बदलते नियंत्रण के बारे में प्रयासों का एक प्रश्न रहा है; जबकि नीतियां निचले स्तरों पर प्रबंधन क्षमता के निर्माण में सफल रही हैं।
यह समझा जाता है कि भारतीय संदर्भ में और वैश्विक स्तर पर 'शासन' और 'सरकार' के बीच फ़ासला बढ़ा है। राज्य के अतिरिक्त कर्ताओं ने संसाधनों के आवंटन में नियंत्रण और प्राधिकार के इस्तेमाल में वृहत्तर भूमिका प्राप्त की है। नीति निर्माण का बिंदु-पथ राज्य से अन्य कर्ताओं की ओर खिसका है; बाजारों और सिविल सोसायटी ने स्वयं अपने लिए वृहत्तर गुजाइश पैदा की है। स्थानीय और वैश्विक स्तरों पर अन्य कर्ताओं के वृहत्तर प्रभाव के कारण राज्य की सत्ता कम हुई है। नव उदारवाद और सुशासन ने राज्य बाजारों और सिविल सोसायटी के बीच के संबंधों में परिवर्तन किया है। नव- उदारवादी प्रतिमान की नींव अकुशल राज्य के आख्यान पर आधारित थी, जबकि नव उदारवादी प्रतिमान अपनी सेवा प्रदायगी के प्रावधान में गरीबों के बहिष्करण के कारण आलोचना का शिकार हुआ।
नीचे दो कथन दिए गए हैं एक को अभिकथन (A) और दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A) : नव-उदारवादी प्रतिमान अकुशल राज्य के आख्यान पर स्थापित किया गया था।
कारण (R) : नव उदारवादी प्रतिमान प्रकृति में समावेशी है।
उपर्युक्त कथनों के संदर्भ में निम्नांकित विकल्पों में से सही उत्तर का चयन कीजिए: