निम्नलिखित गद्यांश को पढ़िए एवं उस पर आधारित प्रश्न का उत्तर दीजिए:
विकास के उदारवादी मॉडल प्रतिरूप का विचार मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था एवं अहस्तक्षेप की नीति पर आधारित है। इस व्यवस्था में व्यक्ति को बाजार के सुपुर्द कर दिया जाता है और यह दावा किया जाता है कि व्यक्ति स्वतंत्र है एवं वह विकास में भाग ले सकता है। यह सुस्पष्ट है कि इस मॉडल में वैश्वीकरण एवं निजीकरण को शामिल किया जाता है, जिसके तहत ऐसा माना जाता है कि पूरा विश्व एक गाँव जैसा है एवं प्रत्येक व्यक्ति मुक्त रूप से एक-दूसरे के साथ व्यापार कर सकता है। इस प्रकार की व्यवस्था में, लाइसेंस व्यवस्था और राज्य नियंत्रण में कमी आती है, तथा आर्थिक, राजनीतिक एवं सामाजिक क्षेत्र में राज्य का कम से कम हस्तक्षेप अपेक्षित होता है। इस मॉडल के अन्तर्गत विकास अधिकतम उत्पादन का समानार्थी होता है जो कि औद्योगीकरण एवं नगरीकरण पर बहुत अधिक बल देता है। इस व्यवस्था में क्योंकि व्यवसाय (व्यापार) के द्वार समग्र विश्व के लिए खुले हुए होते हैं, बहुराष्ट्रीय निगम (कार्पोरेशन) अपनी पहुँच को व्यापक बनाना प्रारंभ करते हैं एवं विकासशील देशों के सम्पूर्ण बाजार विदेशी उत्पादों से भर जाते हैं। फलस्वरूप, उस देश का घरेलू उत्पादन मंद पड़ जाता है। यदि विकास का पैमाना (मात्रा) जिसके बारे में चर्चा की जानी है, तो विकास के स्तर को सकल राष्ट्रीय उत्पाद एवं राष्ट्रीय आय के आधार पर मापा जाता है। इसके मापन के समय, उन व्यक्तियों को इसमें शामिल नहीं किया जाता है, जिनकी आय एवं रोजगार समाज के सबसे निचले स्तर पर होते हैं। वास्तविक रूप में, यह मॉडल राज्य में एक अन्तराल पैदा करने का कार्य करता है। जिसमें एक तरफ तो धनी वर्ग होता है और दूसरी तरफ वह वर्ग जिनकी अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति भी नहीं हो पाती हैं। निश्चित रूप में, यह मॉडल आर्थिक, राजनीतिक एवं सामाजिक स्तर पर हुए व्यक्ति के विकास के बारे में चर्चा करता है, किन्तु यह योग्यतम की उत्तरजीविता के सिद्धांत को केन्द्र में रखता है। इस प्रकार से किसी व्यक्ति का सर्वांगीण विकास असंभव है।