निम्नलिखित गद्यांश को पढ़िए और उसके बाद पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
नाईक, ए जी एम (सामग्री) गुस्से में है और परेशान है। वह कामथ, जी.एम. (सामग्री) से टकरा जाता है, उसकी मेज पर अपना त्याग पत्र फेंक देता है, चिल्लाता है और तत्काल कमरे से बाहर निकल जाता है।
इस अचानक हुए विस्फोट के लिए नाईक के पास कारण है। उसके पास कोई विकल्प ही नहीं था। शायद इस कहानी का विवरण नाईक के चिड़चिड़ेपन का कारण बयान करेगा और यह भी कि वर्तमान कार्यभार को लेने के मुश्किल से चार महीने बाद ही उसने त्यागपत्र क्यों दे दिया।
वर्ष 2021 में नाईक ने विशाखापत्तनम के प्रतिष्टित सेल संयंत्र को छोड़ा था। प्रबंधक सामग्री के रूप में नाईक के पास शक्तियां थी - यहाँ तक कि वह 25 लाख तक की सामग्री के लिए आर्डर दे सकता था। उसे किसी के पूर्व अनुमोदन की आवश्यकता नहीं थी।
नाईक ने कर्नाटक में हरिहर में स्थित एक लुगदी (पल्प) बनाने के संयंत्र में ए जी एम सामग्री के रूप में कार्यभार संभाला। यह संयंत्र भारत के एक प्रतिष्ठित व्यापारिक घराने के स्वामित्व वाले बहु-उत्पाद और बहु-सयंत्र समूह का भाग है। स्पष्ट है कि उपलब्धियाँ, पद और उक्त समूह की प्रतिष्ठता नाईक को सार्वजनिक क्षेत्र की उस एकाश्म इस्पात कंपनी से दूर खींच लाई थी।
जब नाईक ने यूक्लिपट्स लुगदी बनाने वाली कंपनी में कार्यभार संभाला तो उसे यह बोध नहीं था कि 12 लाख रूपये की सामग्री के लिए आर्डर देने हेतु भी उसे पूर्वानुमति की आवश्यकता होगी। उसने यह मान लिया था कि जितनी राशि तक के आर्डर वह विशाल इस्पात निर्माता कंपनी में दे सकता था, उससे आधी राशि का आर्डर स्वयं देने का प्राधिकार तो उसका होगा ही। उसने आर्डर दे दिया, सामग्री आ गई, प्राप्त कर ली गई, स्वीकार की गई और संयत्र में उपयोग कर ली गई।
दिक्कत तब शुरु हुई जब विक्रेता का 12 लाख रुपये का बिल आया। लेखा विभाग ने बिल का भुगतान इस कारण से रोक लिया कि बिल का कामथ ने अनुमोदन नहीं किया था। कामथ ने बिल पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया क्योंकि नाईक ने आर्डर देने से पहले उसका अनुमोदन नहीं लिया था।
नाईक को लगा कि उसे धूमित किया गया है, उसके साथ धोखा हुआ है। कामथ के साथ हुई उसकी छोटे से टकराव ने समस्या को और अधिक बिगाड़ दिया। नाईक को रुखे शब्दों में बता दिया गया कि यह काम करने से पहले उसे कंपनी के नियमों का पता होना चाहिए था। नाईक ने कम्पनी छोड़ने का निर्णय किया।