निम्नलिखित गद्यांश को पढ़िए और प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
एक विकासशील आर्थिक राष्ट्र के लिए, उद्योग की बढ़ती हुई मांगों को पूरा करने व सम्रग GDP में विनिर्माण का हिस्सा बढाने के लिए, उसकी औद्योगिक नीति का नियमित अद्यतन किए जाने की आवश्यकता होती है। चूंकि भारत की GDP में कृषि अथवा विनिर्माण की अपेक्षा सेवाओं का प्रभुत्व रहा है, ऐसे संरचनागत संशोधनों की हमेशा आवश्यकता रहती है ताकि वैश्विक बाजार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विनिर्माण गतिविधियों में भरपूर वृद्धि की जा सके। इसके लिए कानूनी संशोधनों की आवश्यकता है जिनका उद्देश्य अधिक विनिर्माण व निर्यात को सुगम बनाना हो।
वास्तव में भारत के सामने दो चुनौतियां हैं या यूं कहें कि अवसर हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर तेजी के रूख को निर्यातोन्मुखी होना है और साथ ही लगातार बढ़ रही घरेलू उपभोग की मांग को भी पूरा करना है। इसके अलावा कोई भी अर्थव्यवस्था मात्र उपभोग उन्मुखी नहीं हो सकती है, क्योंकि ऐसी अर्थव्यवस्था में जनता को सक्रिय रूप से बचत और निवेश भी करना चाहिए। यह हमें बैंकिंग व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण दिशा की ओर लाता है जो उपर्युक्त दो उद्देश्यों की प्राप्ति में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करती है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को ऋण आवश्यकताओं के क्रेडिट मूल्यांकन हेतु यथोचित कर्मिष्ठता संबंधी सामर्थ्य व विशेषज्ञता निर्मित करने की आवश्यकता होती है। यह उल्लेखनीय है कि वित्त मंत्रालय के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) का मूल्य 7.7 लाख करोड़ रुपये (दिसंबर, 2017 के अनुसार) है। तथापि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की वृहद संरचना और भौगोलिक अंतः स्रवण को देखते हुए, भारत के विकास में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के महत्व को अवश्य स्वीकार किया जाना चाहिए और यह कि "समूचे विश्व में ऐसा कोई देश नहीं है जहां बैंकों को कोई समस्या न रही हो "