गद्यांश पढ़ें और प्रश्नों के उत्तर दें:
रोनैल्ड ड्वार्किन का विचार यह है कि लोगों के कुछ अधिकार तो मौलिक होते हैं लेकिन अनेक अधिकार मौलिक नहीं होते। वे मौलिक हैं क्योंकि वे, "राज्य के विरुद्ध अधिकार हैं। ड्वार्किन का कहना है कि तुरुप के पत्ते के रूप में अधिकारों की अवधारणा, राज्य के विरुद्ध व्यक्ति के अधिकार की विशिष्ट संकल्पना को चिह्नित करता है जोकि संयुक्त राज्य में संवैधानिक सिद्धान्त का केंद्र है" विशेष परिशिष्ट में ड्वार्किन ने इस बात की वकालत की कि सरकार के विरुद्ध अधिकार की संकल्पना उस स्थिति में और भी उपयोगी हो जाती है जब समाज को नस्ली आधार पर बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक में विभाजित किया है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार इसी कोटि में आते हैं। अतः वे सबल अधिकार है। वे जोर देते हैं कि इस अधिकारों की अनुमति होनी चाहिए और इनमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और न ही इनको प्रतिबंधित करना चाहिए। इन स्वतंत्रताओं की अनुमति देनी चाहिए भले ही इससे सामूहिकता के कल्याण का उल्लंघन होता हो।
इसके विपरित, वह अधिकारों के एक बड़े क्षेत्र की पूर्वकल्पना करते हैं जहाँ राज्य सामान्य कल्याण के लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु उन अधिकारों को सीमित करने के लिए विधायन बना सकता है। इन्हें अशक्त अधिकार कह सकते हैं। उदाहरण के लिए समानता का अधिकार, जो एक सशक्त अधिकार है की तुलना में स्वतंत्रता का अधिकार एक अशक्त अधिकार बन जाता है। यह प्रथम दृष्टया परस्पर विरोधी लग सकता है लेकिन ऐसा है नहीं। उदाहरण के लिए सुरक्षा एवं निर्बाध ट्रैफिक प्रवाद के लिए सड़कों पर लोगों की आवाजाही को नियंत्रित करने का अर्थ अधिकारों को सीमित करना नहीं है, दूसरी ओर प्रकाशन पर प्रतिबंध अथवा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध अधिकारों का दमन करेगा भले ही वह सामान्य कल्याण में वृद्धि करे। अतः हालाँकि दोनों विषयों में अधिकार सम्मलित हैं लेकिन एक को सीमित करना न्यायोयित है जबकि दूसरे को सीमित करना सही नहीं हैं।