निम्नांकित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
भारतीय कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 455 में एक नये उपबंध का उल्लेख है जिसे 'निष्क्रिय कंपनी' की संज्ञा दी गई है। कंपनी अधिनियम 1956 में इस अवधारणा का उल्लेख नहीं था। निष्क्रिय कंपनी में उन संस्थापकों को उत्कृष्ट लाभ प्रदान किया जाता है जो कार्पोरेट कवच के अंतर्गत किसी परिसंपत्ति या बौद्धिक संपदा को धारित कर परवर्ती प्रक्रम में इसका उपयोग करना चाहते हैं। उदाहरणार्थ यदि कोई संस्थापक तुलनात्मक रूप से अपेक्षाकृत कम कीमत पर अपनी भावी परियोजना के लिए जमीन खरीदना चाहता है तो वह निष्क्रिय कंपनी के माध्यम से ऐसा का सकता है ताकि वह भावी परियोजना के लिए उस भूमि का उपयोग कर सके। इस प्रकार, निष्क्रिय कंपनी का दर्जा कंपनी अधिनियम 2013 में उल्लिखित एक परिघटना है और साथ ही कंपनी के भावी उपयोग हेतु परिसंपत्तियाँ धारित करने का एक उत्कृष्ट साधन है। निष्क्रिय कंपनी या तो सरकारी कंपनी हो सकती है या निजी कंपनी हो सकती है या एक व्यक्ति के स्वामित्व वाली कंपनी भी हो सकती है।
कुछ कंपनियाँ निगमितीकरण की तारीख से लंबे समय तक अपने व्यवसाय की प्रवृत्ति के कारण कोई व्यवसाय, उदाहरणार्थ बैद्धिक संपदा सृजन के निमित्त कोई व्यवसाय अथवा भावी परियोजना के लिए व्यवसाय, आरंभ करने में समर्थ नहीं हो सकती है और इन कंपनियों का कोई सार्थक लेखांकन लेन-देन नहीं होता है। इस तरह की कंपनी निष्क्रिय कंपनी हो सकती है। निर्माण क्षेत्र की कंपनिया / भू-संपदा से संबंधित कंपनियाँ नयी कंपनियों को भावी परियोजना के लिए भूमि संपत्ति धारित करने के लिए सन्निहित करती है। यह अवधारणा उनके लिए लाभकारी है। इस अवधारणा के द्वारा ये कंपनियाँ कंपनी को शामिल कर सकती है और उस कंपनी में संपत्ति / भूमि का क्रय कर सकती है तथा इस प्रकार निष्क्रिय कंपनी का दर्जा प्राप्त कर सकती हैं। यदि किसी कंपनी को निष्क्रिय कंपनी का दर्जा प्राप्त हो जाता है तो सक्रिय कंपनी की तुलना में निष्क्रिय कंपनी में न्यून अनुपालन होता है। इसके फलस्वरूप निष्क्रिय कंपनियों के अनुपालन लागत की बचत होगी।