निर्देशः निम्नलिखित गद्यांश को सावधानपूर्वक पढ़िए और उसके बाके प्रश्नों के उत्तर दीजिए
भारतीय एकेश्वरवादी ईश्वर के दिव्यदर्शन को साक्षात्कार कहते हैं अर्थात् ईश्वर को अपने मस्तक की (सामान्य) आंखों से देखना। यह ज्ञात रहे कि ईश्वर का दिव्य दर्शन, चाहे पैगंबरों द्वारा हो, ईश्वर उन्हें शांति दे, अथवा पूर्ण दिव्य द्वारा ईश्वर उनकी आत्माओं को पवित्र करे, चाहे इस दुनिया में या अगली दुनिया में, चाहे बाह्य चक्षुओं से या भीतरी चक्षुओं से, उस पर संदेह अथवा विवाद नहीं किया जा सकता है; और जो ग्रंथ के पुरुष (एहल-ए-किताब) हैं, पूर्ण दिव्य और सभी धर्मों के दृष्टा हैं - चाहे वे कुरान के मानने वाले हैं, वेदों के, बुक ऑफ डेविड के या ओल्ड और न्यू टेस्टामेंट के - इमामले में उनकी एक (समान) आस्था है। अब जो ईश्वर को पाने पर विश्वास नहीं करता, वह अपने समुदाय का एक विचारहीन और दृष्टिहीन सदस्य है, कारण यह है; यदि वह परमपिता सर्वशक्तिमान है, तो कैसे उसमें यह शक्ति नहीं है कि वह स्वयं को प्रकट करे। इस विषय को सुन्नी संप्रदाय के उलेमा द्वारा अधिक स्पष्ट रूप में बताया गया है। परन्तु यदि यह कहा जाता है कि परमपिता (घात-ए-बहत) को पाया जा सकता है, यह असंभव है; क्योंकि परमपिता परिष्कृत और अनिश्चित है और, चूंकि उसे निश्चित नहीं किया जा सकता है, वह केवल परिष्कार के आवरण में ही प्रकट है, और इसलिए उसे पाया नहीं जा सकता है और ऐसे उसे पाना असंभव है। और यह सुझाव, कि उसे -- अगली दुनिया में पाया जा सकता है, इस दुनिया में नहीं, आधारहीन है क्योंकि यदि वह सर्वशक्तिमान है, तो उसमें यह शक्ति है कि वह स्वयं को किसी भी तरह से, कहीं भी और किसी भी समय प्रकट करे। (मेरी धारणा है) कि जो उसे यहां (अर्थात इस दुनिया में) नहीं पा सकता है, वहां (अर्थात अगली दुनिया में) उसे मुश्किल से ही पाएगा; जैसाकि उसने पवित्र आयत में कहा है, "जो यहां दृष्टिहीन है, वह इसके बाद (भी) दृष्टिहीन ही रहेगा"
मुतजिला और शिया हकीम जो उसे पाने (रुयात) के विरोधी हैं, वे इस मामले में एक बड़ी भूल कर रहे हैं, क्योंकि अगर उन्होंने मात्र परमपिता को पाने की सामर्थ्य से ही इंकार किया होता, तो फिर भी कुछ औचित्य था, लेकिन रुयात (अर्थात उसे पाने) के सभी रूपों को नकारना एक बड़ी गलती है।