निम्नलिखित अनुच्छेद का अध्ययन कर प्रश्न के उत्तर दीजिए।
पारंपरिक शिक्षण शास्त्रीय उपागमों में यह माना जाता है कि शिक्षक एक निरंकुश व्यक्ति है जो अनुदेश की प्रत्यक्षतः विधियों का प्रयोग करता है। लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अंतर्गत इस भूमिका को पुनः परिभाषित करते हुए प्राधिकार की अवधारणा और प्रयुक्त अनुदेशों के रूप, दोनों ही पुनः विचारणीय हैं। अध्यापक शिक्षक के प्राधिकार के संदर्भ में, अध्यापक शिक्षकों के अधिकार को किसी तरह प्रदर्शित करना या निष्प्रभावित करना कोई मुद्दा नहीं है, चूंकि, यह आमतौर पर सांस्थानिक रूप से अधिदेशित है, परंतु प्राधिकरण इसे अध्यापक शिक्षा के संदर्भ में कैसे करता है, यह विचारणीय मुद्दा है।
दूसरे शब्दों में, ध्यान इस बात पर है कि अध्यापक प्रशिक्षक, अध्यापक शिक्षा की परिस्थितियों का निर्माण कैसे करता है और यह करते समय लोकतांत्रिक सिद्धांतों को कार्यान्वित करने में अपने प्राधिकार का प्रयोग कैसे करता है? इसका उद्देश्य लोकतंत्र के एक रूप को कार्यान्वित करने हेतु एक संकल्पनात्मक स्थान प्रदान करना है, जबकि अधिगमकर्ता सक्रिय रूप से अधिगम समुदाय में सहभागिता करते हैं, जो कि व्यापक समुदाय से बहुत अधिक जुड़ा हुआ है और उसके समृद्ध ज्ञान और विशेषता से लाभ प्राप्त करता है। प्रयुक्त अनुदेश के रूपों के संदर्भ में, शिक्षण ज्ञान संप्रेषण और सर्वोत्तम कार्य व्यवहारों के सिद्धांतों की ओर कम उन्मुख है। अनुदेश के रूप अधिक संवादात्मक और चिंतनशील होते हैं जैसा कि अध्यापक उम्मीदवार विभिन्न दृष्टिकोणों की विविधता, विश्वास, गतिविधियों, नीतियों और कार्य व्यवहारों में संलग्न होते हैं। इस पुनर्पारिभाषित भूमिका के अंतर्गत, अध्यापक शिक्षक अधिगम का सुसाध्यकर्ता होता है, परिचर्चा, संयुक्त समस्या समाधान समझौता और आमसहमति के माध्यम से पूर्व विश्वासों के प्रति उम्मीद्वारों को चिंतनशील विमर्श हेतु उत्तेजित करता है। साकारात्मक सहयोग सहित संबंध वहाँ गैर-सोपानिक शिक्षणशास्त्रीय उपागम के लिए महत्वपूर्ण हैं, जहाँ विद्यार्थी प्रतिस्पर्धाओं की अपेक्षा शिक्षा के क्षेत्र में एक-दूसरे का सहयोग करते हैं।