निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़ें एवं प्रश्नों का उत्तर इसके आधार पर दें।
दिव्यांगता या विशिष्ट क्षमता के साथ जीवन यापन निर्विवाद रूप से चुनौतीपूर्ण है। विशिष्ट क्षमता वाले व्यक्तियों को न केवल अपनी चिकित्सकीय दशाओं के साथ संबद्ध शारीरिक परीक्षणों से गुजरना पड़ता है बल्कि उन्हें समाज में उनके प्रति नकारात्मक धारणा एवं पूर्वाग्रहों से युक्त लोगों के वैयक्तिक दृष्टिकोण के साथ सामञ्जस्य बिठाने की आजीवन प्रक्रिया से भी अनवरत जूझना पड़ता है। सामाजिक लांछनों का सामना करने के अलावा दिव्यांग समुदाय को अनेकों शारीरिक बाधाओं, राजनैतिक निर्बंधनों का सामना करने के साथ-साथ उनमें हीन भावना से ग्रसित होने का भी इतिहास है। सौभाग्य वश दुनिया में उनकी स्वीकृति मिलने की दिशा में उत्तरोत्तर प्रगति हुई है और दिव्यांगों के प्रति लोगों के व्यवहार में निरंतर सुधार हो रहा है तथापि उनकी समानता और उनके पूर्ण समावेशन की दिशा में अभी भी बहुत कुछ किया जाना शेष है। उदाहरण के तौर पर, दिव्यांग महिलाओं को निरंतर अंत:वर्गीय भेदभाव की परीक्षा से गुज़रना पड़ता है जो उनके महिला और दिव्यांग, दोनों होने के कारण है। इसमें मुख्यतः यौन उत्पीड़न शामिल है, इसलिए दिव्यांग व्यक्तियों को अपने पक्ष में स्वयं तर्क रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। परिजनों, मित्रों और सहयोगियों को भी दिव्यांग व्यक्तियों के प्रति सहयोग का भाव अक्षुण्ण रखना चाहिए। यह ऐसा अवयव है जो किसी भी समुदाय की सफलता के लिए महत्वपूर्ण होता है। दिव्यांग समुदाय की सहायता करने वाले पेशेवरों से आग्रह किया जाता है कि वह इस समुदाय की प्रतिकूलताओं के संबंध में स्वयं को शिक्षित करें, इस बात को स्वीकार करें कि अन्य सांसकृतिक अस्मिता वाले लोग दिव्यांग संसकृति से किस प्रकार अंतःक्रियात्मक संबंध रखते हैं और उनसे यह भी आग्रह है कि वह सामर्थ्य आधारित सैद्धांतिक विचारों को लागू करें जिससे उनके सेवार्थियों को बहुत अधिक क्षमता में वृद्धि करने वाले परिणाम प्राप्त होंगे। दिव्यांगों की सहायता करने वाले पेशेवरों से आवाहन किया जाता है कि वह दिव्यांग समुदाय की अस्मिता और उनके सिविल अधिकार संबंधी आंदोलन का नेतृत्व करें।