गद्यांश को पढ़िए और प्रश्न का उत्तर दीजिए :
मैं ने पहले विषय से प्रारम्भ किया - वह है सम्प्रेषण और अंतर्वैयक्तिक बोध जो कि सार्वजनिक विवेचन का केन्द्र है। हमारी भाषा विविध चिंन्तओं को परावर्तित करती है जिन पर हमारे नैतिक मूल्यांकन आरेखित होते हैं। यहाँ बड़ी उलझन, तथ्य और मूल्य हैं लेकिन एक ओर जहाँ "तथ्यों और मूल्यों की उलझन" मुहावरा एक आसान और सुविधान लघुमार्ग है वहीं दूसरी ओर हम प्रारूपिक रूप से तथ्यों, प्रथाओं और मूल्यों को त्रिकोणीय उलझन पर विचार कर रहे हैं। यहाँ हमारे सामाजिक और आचार शास्त्रीय परिपृच्छा संवेदन निर्माण में, प्रथा की समझ की भूमिका, विशेषरूप से महत्त्व देने के योग्य है। वास्तव में, कई दशक-पूर्व जेल से लिखे अपने पत्र में राजनैतिक विचारक एण्टोनियो ग्रैम्स्की ने इसे प्रस्तुत किया, विश्व की अवधारणा निर्माण की प्रक्रिया में कोई व्यक्ति सर्वदा किसी समूह से सम्बद्ध रहता है जो कि सभी सामाजिक घटक या तत्त्व जिससे वह समान विचार एवं कार्य की दिशा साझा करता है। हम सभी नैष्ठिक हैं या किसी अनुरूपतावादी या अन्य धरा के सम्पोषक हैं, हमेशा जनसमूह में एक जन या संकलित-मानव। एक मामला, जो थोड़ा सा विषयान्तर के समान प्रतीत हो सकता है या फिर वाग्विदग्धता, ग्रैम्स्की की विचार-रेखा प्रारम्भ से समसामयिक दर्शन पर उनका उलझन पर क्रेन्द्रण और भाषा के नियमों के प्रयोग पर दूरगामी प्रभाव होता है। मैं ने कहीं और लुडविज विटेगेंस्टीन के सारगर्भित परिवर्तन में दूरस्थ किन्तु महत्त्वपूर्ण भूमिका खासकर उनकी प्रारब्धपूर्ण खोज से दूर एक सम्पूर्ण उत्तरदायित्व जो कभी-कभी थोड़ी भ्रामक कही जाती है, के लिए तर्क प्रस्तुत करने की कोशिश की। 'अर्थ का चित्रण सिद्धान्त' जो कि एक वाक्य की अनुमानित समझ इसके चित्र का एक प्रकार होने से सम्बन्धों की स्थिति का प्रतिनिधित्व करती है ताकि एक प्रतिज्ञप्ति और जो वह व्याख्यायित करता है कुछ सार्थक समझ में एक ही तार्किक स्वरुप रखें।