निम्नांकित गद्यांश को पढ़िए और नीचे दिए गए प्रश्न के उत्तर दीजिए:
जबकी संपूर्ण विश्व कोरोना वायरस के महामारी से हुए आर्थिक गिरावट पर केन्द्रित है, दो अन्य पुराने वायरस भी छिप कर घात लगायें हुये हैं। क्योंकी ये नये वायरस प्राकृतिक रूप से गैर-जैविक है अत: ये टिका-अभेद हैं। उनमें से एक बाजार स्थान आधारित है और दूसरा मन आधारित। जबकि कोरोना वायरस का उद्गम स्थल चीन में वूहान जो हो अथवा नहीं भी हो सकता है, दो नये वायरस यु. एस. में पैदा हुये हैं। सिलिफोन वैली ने इन दो वायरसों के प्रचार प्रसार में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है।
यदि सांस्कृतिक मानव विज्ञान और अर्थशास्त्र के युग्मीय परिप्रेक्ष्य से देखें तो वस्तुतः तीनों वायरस वास्तविक रूप से आपस में जुड़े हुये दिखाई देंगे।
वाणिज्य-व्यापार प्रभाव आधारित विषाणु का संबंध 'विशिष्ट उपभोग' (कंसपिकुअस कंजम्पशन) से है और इस पद को थोर्सटेन वेबलेन, अमरीकी अर्थशतस्त्री तथा समाजशास्त्री, ने अपनी वर्ष 1899 की पुस्तक 'द थिऑरी ऑफ द लिज़र क्लास' ने गढ़ा था। 'विशिष्ट उपभोग' एक सर्व प्रियपद है जो किसी व्यक्ति की आवश्यकता से काफी अधिक गुणवत्ता तथा परिमाण में वस्तुओं को प्राप्त करने की परिपाटी है - एक अधिप्राप्ति प्रक्रिया जो आजकल अमेजन जैसे ई-वाणिज्य के दिग्गजों द्वारा सुनकर किया गया है। यद्यपि 'विशिष्ट उपभोग' का विशेष रूप से पश्चिम में समृद्ध देशों के लाभ संबंध है, यह भारत में भी तेजी से लोकप्रिय हो रहा है जिससे भ्रांत राजनेता तथा आई टी कंपनियां प्रसन्न हो रहे हैं। मुझे यह देखकर बड़ा कुतूहल होता है क्योंकि भारत एक संभ्रांत समाज की परिभाषा - यानि उत्पादन उनमुखी समाज जहां मूलभूत आवश्यकताएँ तथा इसके नागरीकों - का भोजन, वस्त्र तथा आवास को उपलब्ध नहीं करा पाता हैं पर खरा नहीं उतरता हैं।
मन-आधारित विषाणु 'मीम पर केंद्रित होता है और इस पद को ब्रितानी विकासवादी तथा वर्ष 1976 की सर्वाधिक बिक्रीवाली पुस्तक 'द सेल्फिश जीन' के लेखक ने गढ़ा है। 'मीम' सूचना की इकाइयाँ हैं जो मीम-पूल (जीन पूल के सदृश) एक मस्तिष्क से उठकर दूसरे मस्तिष्क में फैलती हैं।