नीचे दिए गद्यांश को पढ़िए और प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
विश्व भर में लगभग सभी प्रकार की शिक्षा में मूल्यांकन का अति महत्वपूर्ण स्थान है तथा हाल के वर्षों में एक अधिक व्यापक प्रकार के मूल्यांकन का उपयोग करने की प्रवृत्ति देखने को मिलती है। मूल्यांकन का यह परिवर्तित प्रकार है सह समूह मूल्यांकन तथा स्व-मूल्यांकन का उपयोग। स्व मूल्यांकन को, "अपने कार्य के मूल्यांकन की क्षमता" (ब्रू, 1999) तथा सह समूह मूल्यांकन को, "एक दूसरे के कार्य का मूल्यांकन करना, अथवा उस पर टिप्पणी करना" के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। जैसा की सभी मूल्यांकन प्रणालियों के बारे में ज्ञात हैं, इन दोनों की भी अपनी-अपनी शक्तियां तथा कमजोरियां हैं। यहांँ यह कहा जा सकता है कि सावधानीपूर्वक प्रारंभ तथा नियंत्रण के साथ सह-समूह मूल्यांकन तथा स्व-मूल्यांकन, मूल्यांकन की प्रभावी प्रणालियां हैं, परंतु इस संक्षिप्त टिप्पणी में यह तर्क दिया जा सकता है कि अधिकांश शैक्षिक विन्यास में जहां कई चीजें बड़ी दांव पर लगी होती हैं, ऐसे वातावरण में ये प्रणालियां उपयुक्त नहीं हैं क्योंकि अंकन (अंक देने की विधि) विश्वसनीय नहीं है।
सह-समूह मूल्यांकन तथा स्व-मूल्यांकन विशेषकर आगे की शिक्षा तथा उच्चतर शिक्षा में मूल्यांकन प्रणाली के रूप में काफी प्रचलित हो रही है। ये शिक्षकों द्वारा अंक दिए जाने के कार्यभार को कम कर रही हैं तथा यह भी दावा किया जा रहा है कि इनसे विद्यार्थियों के समूह कार्य विवेचनात्मक चिंतन में भी वृद्धि होगी यह भी दावा किया जाता है कि यदि आरंभ में हो मूल्यांकन मानदंड पर चर्चा कर उस पर सहमति बनाई जाए, तब शिक्षकों के द्वारा किए जाने वाले विद्यार्थियों के मूल्यांकन में कोई विशेष अंतर नहीं होगा। सामान्यतः यह पाया गया है कि यदि आरंभ में मानदंडों पर चर्चा द्वारा सहमति बनाई जाए, तो ऐसे अध्ययनों में जहां विभिन्न शिक्षकों के मूल्यांकन की तुलना की जाती है, वहां अंकन एक समान रहता है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि आरंभ में समुचित प्रशिक्षण के बाद किसी शिक्षक अथवा विद्यार्थी के द्वारा किए जाने वाले मूल्यांकन कार्य में कोई अंतर नहीं होता है।