निम्नलिखित गद्यांश को पढ़िए और प्रश्न के उत्तर दीजिए-
सप्रू समिति की रिपोर्ट 1945 में प्रकाशित हुई थी। यह विभिन्न घरेलू राजनीतिक हितों के समायोजन के लिए एक संवैधानिक योजना को प्रस्तावित करने का भारतीय प्रयास था। इसमें सार्वभौमिक मताधिकार के मामले का भी समर्थन किया गया। सप्रू समिति ने दावा किया कि यद्यपि राजनीतिक परिस्थितियाँ बदल गई हैं, जैसे-दलीय संरचना का उद्विकास हुआ है, लेकिन ऐसे मामलों में भारी परिवर्तन पूर्ण उत्तरदायी सरकार आने के बाद ही हो सकते हैं। उसने इस तर्काधार पर यह विचार दोहराया कि मताधिकार का नितांत प्रयास शिक्षा प्रदान कर सकता है, जो एक उत्तरदायी राजनीति को सक्षम बनाने के लिए आवश्यक है। प्रमुख राजनीतिक कर्ताओं की घोषणाओं में भी सार्वभौमिक मताधिकार के प्रति समर्थन देखा जा सकता था। राष्ट्रवादी नेताओं ने मताधिकार पर प्रतिबंधों को बढ़ते असंतोष पर नियंत्रण के औपनिवेशिक प्रयासों के रूप में माना। मोहनदास गाँधी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटे थे और स्वाधीनता के बारे में भारत के संपूर्ण प्रयास का तेजी से चेहरा बन गए थे। उन्होंने 1939 में साहसिक ढंग से घोषणा की कि वह निरक्षरता को लेकर चिंतित नहीं है। उन्होंने कहा कि वह पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए असली मताधिकार की सुस्पष्ट रूप से पैरवी करेंगे। इस बारे में उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष के दौरान समाज के निम्न वर्गों के हितों की आवाज़ उठाने वाले बी. आर. अम्बेडकर का सार्थक योगदान था। सामाजिक विभाजनों के मुद्दे पर उनके फोकस ने उन्हें मत के अधिकार पर प्रतिबंधों के प्रति संवेदनशील बनाया। औपनिवेशिक शासन के दौरान शिक्षा और सम्पत्ति पर आधारित अर्हताओं का अर्थ समाज के निम्न वर्गों का वास्तविक बहिष्करण था।