निम्नलिखित गद्यांश को पढ़ें और प्रश्न के उत्तर दें :
टेलीविजन एक सांस्कृतिक वस्तु है। यह आर्थिक रूप से निर्धारित पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के भीतर कार्य करता है, लेकिन जब हम इसके बारे में ऐसा कहते हैं तो हमारा कथन पर्याप्त के साथ-साथ अत्यंत अपर्याप्त भी होता है। एक वित्तीय अर्थव्यवस्था होती है जिसके भीतर घन परिचालित होता है और एक सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था होती है जिसके भीतर अर्थ और आनन्द परिचालित होते हैं और इन दोनों के मध्य का संबंध उतना निश्चयात्मक नहीं होता जितना कुछ सिद्धांतकारों ने प्रस्तावित किया है। वित्तीय अर्थव्यवस्था में टेलीविजन कार्यक्रमों और विज्ञापनों का प्रतीक है न कि विषय-वस्तु का कोई कार्यक्रम एक उत्पादित वस्तु है जो बाद में वितरकों को बेची जाती है। वितरण की प्रक्रिया के दौरान इसकी भूमिका परिवर्तित हो जाती है और यह एक वस्तु से एक उत्पादक में बदल जाता है और इसके द्वारा जो वस्तु उत्पादित की जाती है, वह होता है दर्शक, जिसे बाद में एक उत्पाद की तरह विज्ञापनकर्त्ताओं को बेचा जाता है। इस वित्तीय अर्थव्यवस्था के फलितार्थ अत्यंत रोचक है। यहां वित्तीय अर्थव्यवस्था में कार्यक्रम के भूमिका परिवर्तन -वस्तु से उत्पादक बनता की प्रक्रिया से अब दर्शकों को गुजरना पड़ता है जिन्हें एक उत्पाद के रूप में विज्ञापनकर्त्ताओं को बेच दिया जाता है। किंतु सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था में दर्शक उत्पाद के रूप में अपनी भूमिका को खारिज कर देता है और स्वयं एक उत्पादक बन बैठता है, अर्थ और प्रसन्नता का उत्पादक, और इस क्षण में वह 'दर्शक' की भूमिका को त्याग कर "टेलीविजन देखने की प्रक्रिया के भिन्न भौतिकीकरण बन जाता है। हालांकि सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था का रूपक उत्पादक स्वरूप का है, इससे हमें सांस्कृतिक और वित्तीय अर्थव्यवस्था के बीच के अंतरों को अनदेखा नहीं करना चाहिए। सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था में अर्थ और आनन्द उस तरह परिचालित नहीं होते जैसे वित्तीय अर्थव्यवस्था में धन परिचालित होता है। पहली बात तो यह है कि बिक्री अथवा उपभोग बिंदु पर धन का कोई लेन-देन नहीं होता है। टेलीविजन निःशुल्क प्रतीत होता है, बहरहाल, हो सकता है कि इसके लिए भुगतान किया गया है। भुगतान का उपभोग से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है। लो - बिना अपने सामर्थ्य की चिंता किए जितना चाहें और जिसका चाहें उपभोग कर सकते हैं।