Comprehension Passage
विद्वान जन तीसरी दुनिया के समाजों के पश्चिमी प्रत्यक्षण की ओर संकेत करते हैं। जब वे यह प्रश्न उठाते हैं कि तीसरी दुनिया की स्त्रियों संबंधी ज्ञान का सृजन कौन करता है, तो वे इसी की चर्चा करते हैं। एक भारतीय विद्वान ने खोज की है कि विकास संबंधी अधिकांश नारीवादी साहित्य में तीसरी दुनिया की महिलाओं को 'आवश्यकताएं और 'समस्याएं' रखने के रूप में प्रस्तुत किया जाता है परन्तु जिनके पास बहुत कम विकल्प होते हैं और कार्य करने की कोई स्वतंत्रता नहीं होती है। इस प्रकार की विश्लेषण विधियों से तीसरी दुनिया की एक औसत स्त्री की छवि उभरती है जिसकी रचना सांख्यिकी और कतिपय श्रेणियों के प्रयोग के माध्यम से की गई होती है। कहा जाता है कि तीसरी दुनिया की एक औसत स्री अपने लिंग पर आधरित और तीसरी दुनिया - अनभिज्ञ, निर्धन, अशिक्षित, परम्पराओं से बंधी, घरेलु, परिवारोन्मुखी और पीड़ित होने के कारण अनिवार्यतः एक रुंडित जीवन व्यतीत करती है। यह छवि पश्चिमी स्त्री के शिक्षित, आधुनिक और अपने निर्णय स्वयं करने की स्वतंत्रता रखने के स्व-चित्रण से विपरीत है। ये चित्रण यह कल्पना करते है कि पश्चिमी मानक वे निर्देश चिन्ह हैं जिनसे तीसरी दुनिया की स्त्रियों की स्थिति को मापा जाए। इसका परिणाम है पश्चिमी स्त्रियों की तीसरी दुनिया की स्त्रियों के प्रति पितृसत्तात्मक अभिवृत्ति। यह पश्चिम की श्रेष्ठता के प्राधान्य विचार का सततीकरण है। तीसरी दुनिया में स्त्रियों के उत्पीड़न के समरूपीकरण और व्यवस्थापन की इसी प्रक्रिया में, अधिकांश पश्चिमी नारीवादी विमर्श में शक्ति का प्रयोग किया जाता है। इस शक्ति को व्याख्या की अपनी विषयनिष्ठ प्रकृति के कारण पुनः परिभाषित किए जाने की आवश्यकता है।

पश्चिमी नारीवादी साहित्य तीसरी दुनिया की स्त्रियों को निम्नलिखित में से किस रूप में चित्रित करता है?

1
जिनके पास कम विकल्प हैं और कोई स्वतंत्रता नहीं है 
2
बाह्य प्रभावों से महत्तर समर्थन 
3
आधुनिकीकरण की प्रसुविधाएं 
4
पश्चिमी प्रभाव के अधीन 

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