गद्यांश को पढिये और प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
द्वितीय विश्व युद्ध से सम्पूर्ण विश्व में 'फुरसत के क्षण' में जबरदस्त रूप से बढ़ोत्तरी हुई है। इस समयावधि में सामाजिक समस्यायों और व्याधियों में भी बढ़ोत्तरी हो गयी है। कुंठा, मानसिक संतुलन खो बैठना, विवाह-विच्छेदन, शराब का आदी होना और अपराध दरें, बहुत अधिक समय होने के साथ ही कुछ नही करने के लिए नही होने से, सीधे तौर पर संबंधित हैं। इसे वर्जनाहीनता के साथ जोड़ने से जिसने हमारी संस्कृति और प्रत्येक राष्ट्र निष्पादन और ईमानदारी से किए गए कार्य की दैनिक देय के लिए ईमानदार प्रयास के विचार को पुर्न प्रचारित करेगा। निश्चित रूप में विश्व आजीविका प्रदान करने के लिए जिम्मेवार है लेकिन इसके लिए हमें कार्य करना पड़ेगा। हमें थोड़ा करने और अधिक पाने के सिद्धान्त को बदलना है अथवा हम अपने आपको गुणवत्ता वाली वस्तुओं और सेवाओं के बाहर मूल्य परक होने की कठिनाई में फँसा लेंगे। केवल वही योजना जो लंबे समय के लाभ पर कार्य करने जा रही है हमारे सिद्धांत में एक आंतरिक बदलाव है। हमें अवश्य ही उचित मूल्य पर उपभोक्ता की माँग वाले गुणवत्तापरक वस्तु का उत्पादन करना होगा अथवा उपभोक्ता का बस उतना ही कार्य किया जाए जितने मात्र से काम चल जाए की प्रवृत्ति को अनुमत किया है और समस्याये कई गुणा बढ़ गयी है। श्रमिक लोग अपनी कार्यकुशलता में निहित सम्मान को प्रायः खो देता है और उनका निष्पादन गिरा प्रारंभ हो जाता है। जब निष्पादन गिरने लगता है तब रही वस्तु का उत्पादन होता है और रही वस्तु को एक उचित बाजार नही प्राप्त होता क्योंकि उपभोक्ता प्रत्येक जगह गुणवत्ता का ध्यान रखना है। वे उपभोक्ता विदेशी आयतों की ओर उन्मुख हो जाते हैं और स्थानीय उत्पादक विक्रय की मात्रा को कम कर देने से दबाव में फँस जाता है। झुकाव आयातित वस्तुओं की तरफ अधिकाधिक होगा सौभाग्य से हम इसे कर सकते हैं। हम इसे बिना किसी मानसिक आरक्षण के करते है, क्योंकि नियंत्रित परिक्षण के अन्तर्गत स्थानीय श्रमिक परियोजना-दर-परियोजना अपने समकक्षों से लगातार अधिक उत्पादन करता है। उच्च गुणवत्ता का मतलब उच्च कीमत है। ईमानदार प्रयास न कि उच्च प्रशुल्क का होना ही समस्या का समाधान है।