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स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उत्पन्न महा सांस्कृतिक नवजागरण से सृजनात्मक गतिविधि के विविध क्षेत्रों में परंपरा के साथ बहुत सार्थक सामना हुआ है। परंपरा की खोज और उसकी वापसी के प्रयास परंपरा की जड़ों तथा अस्मिता की तलाश से प्रेरित थे। यह जीवनशैली मूल्यों, सामाजिक संस्थाओं सृजनात्मक रूपों तथा सांस्कृतिक प्रथाओं के विउपनिवेशन की संपूर्ण प्रक्रिया का एक भाग था।
आधुनिक भारतीय नाट्यकला / रंगमंच, जो उपनिवेशीय रंगमंचीय संस्कृति से निर्मित था, ने परंपरागत दिशा से पूरी तरह विस्थापित संस्कृति से सामना करने के लिए अत्यंत तीव्रता के साथ जड़ों की तलाश की आवश्यकता महसूस की। बी. वी. कारंथ, के. एन. पणिक्कर और रतन थियम जैसे निर्देशकों ने परंपरा के साथ अत्यधिक सार्थक रूप से सामना किया और उनके कार्य ने समकालीन रंगमंच की उपनिवेशी दिशा को पलट दिया है और इसे महान नाट्यशास्त्र की परंपरा के रास्ते पर वापस ला दिया। यह विरोधाभासी ध्वनित होता है, परंतु उनका रंगमंच / नाट्यकला पारंपरिक यथार्थवादी रंगमंच के संदर्भ में नवीन और प्रगतिशील दोनों है और अभी भी नाट्यशास्त्र की रंगमंचीय परंपरा से संबंधित है।