निम्न गद्यांश को पढ़िए व उसके बाद पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
विगत 160 वर्षों में, औद्योगीकृत विश्व में आयु संभाविता में प्रति वर्ष एक चौथाई वर्ष की स्थिर दर से वृद्धि हुई है। आरंभ में इस परिवर्तन को उन चीजों के प्रसार से गति मिली थी जिन्हें आज हम बहुधा महत्व नहीं देते है स्वच्छ जल, सीवर और अपशिष्ट निस्तारण, उत्तम पोषण, टीका और प्रतिजीवाणु। 1970 के दशक के उत्तरार्द्ध तक ये अभिनव परिवर्तन ह्रासमान प्रतिफल के बिन्दु तक पहुँच गए थे, तथापि लगभग उसी समय पर शेष रहे सर्वाधिक घातक खतरों कैंसर, हृदय रोग और आघात के विरुद्ध संघर्ष में नई प्रौद्योगिकियों ने वास्तविक लाभ उत्पन्न करना आरंभ कर दिया। सर्वाधिक अल्प विकसित देशों की गणना करते हुए भी, बीसवीं शताब्दी के आरंभ के समय की लगभग 35 वर्ष की आयु संभाविता से ऊपर उठकर आज विश्वव्यापी स्तर पर औसत व्यक्ति लगभग 70 वर्ष जीवित रहने की प्रत्याशा कर सकता है।
यद्यपि भविष्य का पूर्वानुमान लगाना निश्चित रूप से असंभव है, अनेक प्रगतिशील विचारकों ने इस संभावना पर चर्चा आरंभ कर दी है कि अगले बीस वर्षों में किसी बिन्दु पर ऐसा शिशु जन्म लेगा जो एक सौ चालीस वर्ष की आज अकल्पनीय आयु तक जीवित रहेगा और आगे उसके बच्चे एक ऐसे विश्व को देख सकेंगे जिसमें जीवित रहने की कोई अपेक्षित " प्राकृतिक" आयु सीमा नहीं होगी। यादृच्छिक दुर्घटना अथवा जानबूझकर की गई हत्या को छोड़ दें, तो हम से केवल दो पीढ़ी बाद के स्त्री पुरुष संभवतया अनंत काल तक जीवित रहें। सिद्धांत रूप में, आवश्यकता बस इतनी है कि प्रौद्योगिकी व्यक्ति के जरण से तीव्रगति से उन्नति करती रहे।
तथापि ऐसे आशावाद को जीवन की सामाजिक व शारीरिक सीमाओं से अवश्य ही संतुलित करना होगा। आज की विकासशील प्रौद्योगिकियाँ आयु स्पेक्ट्रम के ऊपरी छोर पर निसंदेह अधिकाधिक महंगी होंगी और धनी व निर्धन के बीच की खाई को और बढ़ा देंगी। जैसे-जैसे जीवन अवधि बढ़ेगी, पूर्व में अपवाद स्वरूप पाए जाने वाले रोग और अधिक विशालकाय हो जाएंगे। विस्मृति रोग (अल्जाइमर), जो आज के वृद्धजनों के लिए एक बढ़ता खतरा है, 1950 के दशक से पूर्व लगभग अज्ञात था, मुख्यतया इस कारण, सांख्यिकीय रूप से कहें तो, कि अधिकांश व्यक्तियों की इसके लक्षण उत्पन्न होने से पूर्व ही मृत्यु हो जाती थी।