निम्नलिखित गद्यांश को पढ़िए और प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
माल्थस (1766-1834) ने 1798 में अपना निबंध ऑन द प्रिंसिपल ऑफ पॉपुलेशन (जनसंख्या के सिद्धांत पर निबंध) लिखा था। उन्होंने कहा कि जनसंख्या की समस्या का मर्म यह है कि यदि इसे एक सीमित भूभाग में पर्याप्त खाद्य आपूर्ति की संभावना से परे तक अनियंत्रित रखा जाए तो मानव-जाति में जनसंख्या वृद्धि का भाव रहता है। माल्थस का विचार था कि मुख्यतः कृषि-योग्य उत्पादन में अधिक भूमि को लाकर खाद्य आपूर्ति में वृद्धि को प्राप्त किया गया। उनका मानना था कि समांतर श्रेणी में एक स्थिर मात्रा द्वारा खाद्य आपूर्ति में अधिकाधिक वृद्धि की जा सकती है, जबकि मानव जनसंख्या प्रत्येक बार अपने को गुणित ढंग से गुणोत्तर श्रेणी में वृद्धि को प्रवृत्त होती है। समय के साथ जनसंख्या तब तक खाद्य आपूर्ति की तुलना में बढ़ेगी, जब तक कि दुर्भिक्ष, बीमारी या युद्ध के रूप में कोई महाविपत्ती घटित ना हो। युद्ध घटित होगा क्योंकि मानव समूह अधिकाधिक दुर्लभ हो रहे संसाधनों पर लड़ाई करते आये हैं। ये सीमाकारी कारक दीर्घकालिक दृष्टि से जनसंख्या और संसाधनों के बीच एक संतुलन बनाए रखते हैं। माल्थस ने अपने बाद के लेख में जनसंख्या पर नियंत्रण में एक महत्वपूर्ण कारक के रूप में 'नैतिक संयम' पर अत्यधिक बल दिया।
स्पष्ट है कि माल्थस अठारवीं शताब्दी में और उसके पूर्व की घटनाओं से प्रभावित थे और उसके बाद की दो शताब्दियों में प्रकट होने वाली उस अत्यधिक प्रगति का पूर्वानुमान नहीं लगा सकते थे, जिसने संसाधनों के दोहन एवं उपयोग में भारी वृद्धि के साथ-साथ जनसंख्या को एक अभूतपूर्व दर पर बढ़ने दिया। माल्थस के समय से कृषि में बहुत अधिक प्रगति हुई हैं, जिन्होंने कृषि उत्पादन में भारी वृद्धि में योगदान किया। इस बहुत अधिक प्रगति में- कृत्रिम उर्वरक एवं कीटनाशकों का विकास, नई सिंचाई तकनीक, फसलों की उच्च उपजकारी किस्में, का संकरण, ग्रीनहाउस खेती और समुद्र से भूमि प्राप्त करना सम्मिलित हैं।