दिए गए गद्यांश को पढ़िए और प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
पिछले डेढ़ सौ वर्षों के दौरान विज्ञान और उससे जनित तकनीकों ने मानव द्वारा कृषि कार्य अपनाए जाने के बाद मानव जीवन में हुए परिवर्तनों से अधिक परिवर्तन किया है, और विज्ञान द्वारा परविर्तन सतत रूप से त्वरित गति से हो रहा है। कुछ वैज्ञानिक अधित्यका पर किसी नये स्थायित्व का कोई संकेत नहीं है। इसके विपरीत, यह विचार करने का हर कारण है कि अब तक जो प्राप्त हुआ हैं, उसके परे विज्ञान की क्रान्तिकारी संभावनायें अमापनीय रूप से विस्तारित हैं। क्या मानव जाति इन प्ररिभ्रामी रूपांतरण के साथ शीघ्रतापूर्वक पर्याप्त रूप से समायोजन कर सकती है, या जैसा कि असंख्य पूर्व प्रजातियों (स्पीशीज) ने किया है, वैसा ही अनुकूलनीयता के अभाव में यह मानव जाति भी समाप्त हो जाएगी। अपने काल में डायनोसोर सृष्टि निर्माता थे, और यदि उनके बीच दार्शनिक रहे होते तो किसी ने भी यह पूर्वानुमान नहीं किया होता कि संपूर्ण प्रजाति विनष्ट हो सकती है। परंतु वे विलुप्त हो गए क्योंकि वे दलदल रहित दुनिया (भूमंडल) से अपने को अनुकुलित नहीं कर सके। मानव और विज्ञान के मामलों में, पूर्णतया एक नवीन कारक है, जैसे कि मानव स्वयं पर्यावरण परिवर्तन कर रहा है जिसमें उसे अभूतपूर्ण तीव्रता के साथ स्वयं को समायोजित करना होगा। परंतु यद्यपि मानव अपने वैज्ञानिक कौशल द्वारा पर्यावरण में परिवर्तन का कारण है, इन परिवर्तनों में अधिकांश परिवर्तन मानव प्राणी के इच्छा के अनुरूप नहीं होते हैं। यद्यपि ये परिवर्तन मानव अभिकरणों द्वारा किए जाते हैं, जो अभी तक प्राकृतिक बलों की अनमनीय अनिवार्यता की कोई चीज़ मानी जाती थी। चाहे प्रकृति दलदल को शुष्क बनाए या मानव सप्रयास जल निकास करे, उसके अंतिम परिणाम में कोई अंतर नहीं होता है। क्या मानव अपने कौशल द्वारा लाये गये पर्यावरण परिवर्तन के बीच जीवित रहने में समर्थ होगा, यह प्रश्न अभी भी बना हुआ है। यदि इसका उत्तर सकारात्मक है किसी दिन इसका पता चलेगा यदि नहीं तो नहीं। यदि उत्तर सकारात्मक होने वाला है; मानव को स्वयं और उनकी संस्थाओं के प्रति चिंतन के वैज्ञानिक तरीके का प्रयोग करना होगा।