निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर उसके आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
आज का युग भौतिकवादी युग है। वैज्ञानिक प्रगति ने जीवन को सरल व सुखी बनाने के लिए एक से बढ़कर एक आविष्कार कर डाले हैं। प्रत्येक कार्य के लिए आज मशीनें उपलब्ध हैं। विज्ञान के इन साधनों को देखकर हर वर्ग का व्यक्ति इनका उपभोग करना चाहता है। इसी कारण इस युग में मानव की महत्वाकांक्षा में अत्यंत वृद्धि हुई है। प्रत्येक व्यक्ति सुख प्राप्त करने के लिए अधिकाधिक साधन एकत्रित करना चाहता है। वर्तमान समय में विश्व के अनेक देशों में सुख-सुविधा के अधिकांश साधन सहजता से उपलब्ध हैं परंतु इन देशों के धनी निवासी भी सुखी नहीं हैं। इसका कारण संतोष का अभाव है। संतोषी व्यक्ति के पास यदि सुख-सुविधा का अभाव भी हो, तब भी वह सुखी रहता है। एक संत कवि ने ठीक ही कहा है चाह गई चिंता मिटी, मनुवा बेपरवाह। जिसको कछु न चाहिए, सो ही शहनशाह ।
व्यक्ति के हृदय में संतोष की भावना जागृत होते ही उसकी समस्त चिंताएँ मिट जाती हैं। चीन के प्रसिद्ध दार्शनिक लाओत्से तथा कन्फ़्यूशियस भी संतोषवृत्ति के कारण स्वयं को विश्व का सर्वाधिक सुखी व्यक्ति अनुभव करते थे। विश्व विजेता सिकंदर ने एक भारतीय संत से कहा कि वह उससे कुछ भी माँग ले। संत ने शांत भाव से कहा कि मुझे किसी भी वस्तु की आकांक्षा नहीं है। भक्त कुंभन दास को भी सम्राट अकबर ने कोई बहुमूल्य वस्तु माँगने को कहा, किंतु कुंभन दास ने कहा कि उन्हें किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है फिर भी सम्राट यदि कुछ देना चाहते हैं तो वे भविष्य में उन्हें अपने निकट बुलाने का आग्रह न करें। संतोषी व्यक्ति लालसा से रहित होता है, वह किसी भयभीत नहीं होता। उसके लिए सत्य का निर्वाह करना सरल होता है। अतः कहा जा सकता है कि संतोष ही परम धन है और जिसके पास यह अमूल्य धन होता है, वही जीवन में सच्चा सुख प्राप्त करता है।