निर्देश: नीचे दिये गये गद्यांश का ध्यानपूर्वक अध्ययन करें और निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर दें
देश अब शासन के संकट का सामना कर रहा है I किसी भी रूप में देखें तो देश की आर्थिक और सामाजिक प्राथमिकताओं के प्रति प्रशासनिक प्रणाली बुरी तरह से निष्क्रिय और गैर-जवाबदेही हो गयी है I
स्वतंत्रता के बाद सरकारी तन्त्र का बुनियादी रूप से विस्तार हुआ है I मंत्रालययों और विभागों की संख्या कई गुना बढ़ गयी है I गरीबों को राहत और सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए प्रत्येक पञ्चवर्षीय योजना में ढेर सारे कार्यक्रम आरम्भ किए गए हैं I इसमें कोई संदेह नहीं कि कुछेक कार्यक्रमों ने गरीबी को कम करने और अकाल की रोकथाम में मदद पहुँचाई है, लेकिन प्राशसनिक उदासीनता, उपेक्षा और संसाधनों के गलत जगह इस्तेमाल के कारण गरीबी उन्मूलन के परिणाम अभी लक्ष्य से काफी दूर है I
मेरे विचार से विकास की उच्च अवस्था के दौरान भी अमीर और गरीब के बीच की दूरी बढ़ाने और भारतीय अर्थव्यवस्था में द्वैतवाद को जन्म देने में जिन महत्त्वपूर्ण राजनीतिक कारकों ने कारगर भूमिका है, वे इस प्रकार हैं –
पिछले पाँच दशकों में देश के शासन में मंत्रालयों की भूमिका बढ़ी है, लेकिन इसके साथ ही उनकी जवाबदेही घटी है I
गरीबी घटाने की तात्कालिक ज़रूरतों के मद्देनज़र विभिन्न मंत्रालयोंने गरीबों के लिए महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रमों और वार्षिक तथा पंचवर्षीय लक्ष्यों की घोषणा में काफी तेज़ी दिखाई है, लेकिन वास्तविक प्रदर्शन के लिए किसी भी मंत्री, मंत्रालय या सरकार ने ज़िम्मेदारी नहीं ली है I
समय-समय पर रिपोर्ट लिखी गई है, मुद्दों पर बहस की गई तथा सतकर्ता और दूसरी एजेंसियों ने विभिन्न नीतियों और नियमों के उल्लंघन को रेखांकित किया है, लेकिन गरीबी उन्मूलन और आम आदमी की मदद में घोषणाओं के अलावा राजनीतिक स्तर पर शायद ही कोई प्रभावी कार्रवाई की गयी हो I प्रशासनिक ढाँचे में हर स्तर पर नौकरशाही के राजनीतिकरण में और मंत्रियों के हस्तक्षेप में वृद्धि हुई है I सार्वजनिक सेवाओं की आपूर्ति बुरी तरह से प्रभावित हुई है I
आमतौर पर विपरीत उद्देश्यों के लिए काम करने वाले नानाविध संगठनों और सरकारी विभागों में विचारों और नीतिगत नज़रिए में उत्पन्न मतभेदों को विश्लेषण हेतु राजनीतिक स्तर पर अधिक से अधिक ऊँचाई पर ले जाया जाता है I इस स्थिति में कई सारी स्थायी और तदर्थ कैबिनेट समितियों और मंत्रियों समूह अस्तित्व में आते हैं, जो समय-समय पर विभिन्न मामलों के लिए बैठकें करते रहते हैं I इन समितियों के किसी निर्णय पर पहुँचने तक प्राशासनिक प्रणाली ठप पड़ी रहती है I चुनावों के बार-बार आयोजनों के परिणामस्वरुप मंत्रियों के अल्प कार्यकाल के कारण निर्णय लेने की प्रक्रिया लम्बी और जटिल हो गयी है I