निर्देश: दिए गए गद्यांश के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
बीते कुछ वर्षों में, जलवायु परिवर्तन के चेहरे ने विश्व भर के पारिस्थितिकी तंत्र और मानव जीवन पर अपने दीर्घकालिक प्रभावों को उजागर किया है। विशेष रूप से, भारतीय उपमहाद्वीप, जिसकी आर्थिक और सामाजिक स्थिरता काफी हद तक अपनी कृषि समृद्धि और जल संसाधनों पर निर्भर करती है, जलवायु परिवर्तन के प्रत्यक्ष प्रभाव की चपेट में है। हाल ही में, विश्व मौसम विज्ञान का समुदाय इस नतीजे पर पहुँचा है कि लानीना और अल नीनो जैसी जलवायु घटनाएँ भारतीय मानसून की अनिश्चितता में योगदान दे रही हैं।
विज्ञान के साथ-साथ लोक गाथाएं भी इसी संदेश को साझा करती हैं। ग्रामीण किसानों की बोलचाल की भाषा में, "चैत की बूँदें, सावन को बांझ बनाती हैं", यानी अगर चैत माह (मार्च-अप्रैल) में बारिश होती है, तो सावन (जुलाई-अगस्त) सूखा पड़ सकता है। यह धारणा न सिर्फ प्राचीन ज्ञान को दर्शाती है, बल्कि जलवायु परिवर्तन के प्रति हमारे अवलोकनों को भी पुष्ट करती है।
इस पृष्ठभूमि के खिलाफ, विश्व जल सम्मेलन में, जल संसाधनों पर बढ़ते संकट को लेकर चिंताजनक रिपोर्ट्स प्रस्तुत की गईं। विश्वास है कि 2050 तक, भारत जैसे देश, जिनकी अधिकतर आबादी खेती पर निर्भर है, भीषण जल संकट से जूझ रहे होंगे। विस्तार से, रिपोर्ट में भारत में हिमालयी नदी प्रणालियों के संकुचन पर चर्चा की गई, जिनमें गंगा, यमुना, और ब्रह्मपुत्र जैसी मुख्य नदियां शामिल हैं। ये नदियां अपने ग्लेशियर स्रोतों की ह्रासशीलता के कारण, जिनमें से कुछ पिछले कुछ दशकों में काफी संकुचित हो चुकी हैं, भविष्य में जल प्रदान करने में असमर्थ हो सकती हैं। हिमालय पर हालिया अध्ययन बताते हैं कि वार्षिक तापमान में वृद्धि, इन ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार को बढ़ा रही है, जिससे न केवल जल स्त्रोतों पर बल्कि इसके आश्रित समाजों पर भी गहरा प्रभाव पड़ेगा।
ये बातें समझने की आवश्यकता है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अकेले प्रौद्योगिकीय हल या एकल नीतिगत उपाय पर्याप्त नहीं होंगे; बल्कि सामाजिक, आर्थिक, और पर्यावरणीय दृष्टिकोण से एक एकीकृत पहल की आवश्यकता होगी।