Comprehension Passage

निर्देश: निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर 1 से 5 तक के प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

प्रकृति तथा मनुष्य के बीच गहराता पारिस्थितिकीय संकट एक चिंतनीय मुद्दे के रूप में समूचे विश्व के सामने आ खड़ा हुआ है। ज्यादा से ज्यादा कृषि भूमि को व्यावसायिक कर लेने की ललक में वनों की अंधाधुंध कटाई, नदियों की गति और दिशा में मनमाना परिवर्तन, मिट्टी में क्रमशः विकसित होती अनुर्वरता और उसे अधिक उपजाऊ बनाने की हड़बड़ी में रासायनिक खादों का बेशुमार प्रयोग, औद्योगीकरण और शहरीकरण, खनिज उत्खनन के नाम पर प्रकृति का जरूरत से ज्यादा दोहन, पर्यावरण प्रदूषण, मौसम में परिवर्तन, समुद्र का अम्लीकरण, ओजोन परत का क्षय, जैव विविधता का क्रमिक ह्रास - मनुष्य के सभ्य होते चले जाने का बर्बर इतिहास है। या यों कहें कि मनुष्य के एकांगी विकास का विकृत ग्राफ जहाँ उसकी चिंताओं में सिर्फ उसका अपना 'होना' है, दूसरों के अस्तित्व की कीमत पर अपनी एषणाओं की पूर्ति का हठ। लेकिन 'होना' (बीइंग/अस्तित्व) क्या इतनी निरपेक्ष अवधारणा है जबकि समूची सृष्टि सापेक्षता के सिद्धांत और संबंध में बंधी हुई है। सृष्टि की संरचना ही कुछ ऐसी है कि इसका प्रत्येक अणु स्वायत्त होते हुए भी अपने अस्तित्व रक्षण के लिए दूसरे के अस्तित्व की अनिवार्यता से जुड़ा हुआ है। उदाहरण के लिए फूड वेब को लिया जा सकता है। जहाँ कहीं एक भी कड़ी टूटी या ढीली पड़ी, वहीं प्राकृतिक कोप चेतावनी बन कर मनुष्य की निरंकुश वृत्ति पर चोट करने लगता है। पारिस्थितिकीय विमर्श दरअसल प्रकृति की इन्हीं चेतावनियों को सुन कर मनुष्य द्वारा अपनी गलतियों को सुधारने, लाभ और लोभ की गोद में पली बेलगाम लालसाओं को 'सिधाने'; और प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण समन्वयात्मक संबंध स्थापित करने की चेतना का नाम है। प्रकृति यानी मनुष्य की कार्यस्थली ही नहीं बल्कि जीवनशक्ति भी है; और जीवन रूपी प्रयोगशाला की सबसे भरोसेमंद सहायक और गुरु भी है यहाँ अपने अस्तित्व को बचाने का अर्थ बन जाता है।

प्रस्तुत गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक क्या होगा?

1
जैविक संकट
2
पारिस्थितिकीय समस्या
3
जैव विविधता
4
अस्तित्व विमर्श

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