Comprehension Passage
निर्देश: दिए गए गद्यांश को पढ़कर प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
यह सच है कि वृद्धावस्था में शारीरिक-शक्ति क्षीण होती जाती है पर उसके कष्ट जितने कल्पित हैं उतने यथार्थ नहीं हैं। बात यह है कि शक्ति के अभाव का हमें ज्ञान ही नहीं हो पाता। तरुणावस्था में जो शाक्त बाह्य जगत में जाकर विकीर्ण होती है वही अब अंतर्जगत में रहकर एकत्र सी हो जाती है। जिन कामों में शारीरिक शक्ति की विशेष आवश्यकता है उनके प्रति आपसे आप विरक्ति हो जाती हैं। परंतु उससे आनंद की अनुभूति कम नहीं होती। मैं कभी फुटबाल खेला करता था और खैरागढ़ से छुईखदान तक दौड़ लगाया करता था। पर फुटबाल खेलने की ओर जरा भी प्रवृत्ति नहीं होती। अब तो फुटबाल ग्राउंड या क्रिकेट फील्ड में चुपचाप बैठकर देखने में ही आनंद आता है। उस समय 'जितेंद्र' से कैच छूटने पर या 'जोधा' से कुछ भूल होने पर हम लोग अपने समय के दिग्गजों की अपूर्वता का वर्णन करने लग जाते हैं। 'कस्तूरचंद' और मिनाजुद्दीन के बॉलिंग तथा 'युधिष्ठिर' और 'वंशबहादुर' के खेल के वर्णन में वर्तमान तो बिल्कुल क्षुद्र हो जाता है। 'महाराज जी' के बराबर अब कौन 'बैक' खेलेगा! इन्हीं अतीत भव्य बातों का स्मरण कर वर्तमान की ओर इतना उपेक्षा भाव मन में आ जाता है कि उसमें सम्मिलित होने की जरा भी इच्छा नहीं होती। यही वृद्धावस्था का सच्चा लाभ है। यही कारण है कि शारीरिक शिथिलता और हृास का अनुभव करते हुए भी हम यह नहीं समझते कि इसमें कोई अभाव है। संसार के कार्य-क्षेत्र में हम युवकों के लिए आपसे आप स्थान छोड़ देते हैं, क्योंकि उसके लिए स्पृहा नहीं रह जाती। वृद्धावस्था में जो गौरव का भाव आ जाता है वह तारुण्य को तिरस्करणीय कर देता है। तारुण्य की लालसा, महत्वाकांक्षा, क्षिप्रता, अदूरदर्शिता सभी उसके लिए अग्रगण्य हैं।‘तरुणावस्था’ व्यक्ति के विकास की किस अवस्था को कहा जाता है?
1
बचपन
2
युवा
3
बुढ़ापा
4
शैशव