Comprehension Passage

निर्देश: निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर 1 से 5 तक प्रश्नों के उत्तर दीजिये:

दोहरी अपेक्षाएं और ज़िम्मेवारियां पाठक और लेखक को एक दूसरे से एक क्षण भी जुदा नहीं होने देतीं। एक साथ रचना में उपस्थित रहना दोनों के लिए जोखिम भरा काम है। सिर्फ़ आंख मूंदने से दूसरा अनुपस्थित नहीं हो जाता बल्कि और विराटता से सामने आता है। वस्तु की अपेक्षा वस्तु का आभास ज़्यादा दबाव डालता है। यह आत्मिक पारस्परिकता आज के लेखक की अगर शक्ति बना हुआ है तो चुनौती भी। इससे वे तमाम संघर्ष पैदा होते हैं जहां लेखकीय यथार्थ और यथार्थ की अपेक्षाएं समानांतर बनी रहती हैं, एक नहीं होतीं, जुड़ती नहीं। आमने-सामने रह कर दूर तक साथ चलती हैं। यथार्थ और अपेक्षित यथार्थ एक अंतर बनाए रखते हैं। हम अपना यथार्थ रचना में देखने की अपेक्षा करते हैं, लेकिन रचना सिर्फ़ उस का वायदा करती है, उस की संभावना रचती है। उस वायदे पर हम कितना भरोसा करते हैं या उस संभावना को कितना स्वीकार करते हैं, इसी में रचना की शक्ति है। लेकिन अगर लेखक का यथार्थ बिल्कुल किसी और ही अनुभव स्त्रोत से आ रहा हो तो रचना पाठक के समानांतर चलते हुए एक निरन्तर साथ बने रहने का अनुभव रचती है और आदान प्रदान का संवाद भीतर ही भीतर रचती है। लेखकीय अनुभव चाहे जिस धरातल पर भी हो, और चाहे जितना भिन्न क्यों न हो, उस की शक्ति इन दो स्थितियों में ही है। पाठक को समानान्तर बनाए रखने में या कहीं एक दूरी के बाद अपने अनुभव के धरातल पर स्थानान्तरित कर सकने की अदभुत सामंजस्य क्षमता में। लेखकीय भाव अधिकतर पाठक की इन दोनों स्थितियों को केवल खंडित ही करता है।

कोई रचना पाठक के समानांतर चलते हुए उसके साथ बने रहने का अनुभव कब रचती है?

1
जब यथार्थ की अपेक्षाएँ आमने सामने रह कर दूर तक साथ चलती हैं।
2
जब हम अपना यथार्थ रचना में देखने की अपेक्षा करते हैं।
3

जब लेखक का यथार्थ किसी अन्य अनुभव स्रोत से आ रहा हो।

4
लेखकीय यथार्थ और यथार्थ की अपेक्षाएं आमने-सामने रह कर दूर तक साथ चलते हैं

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