अनुदेश - निम्नांकित गद्यावतरण को पढ़कर नीचे दिये गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
"कवि यदि अपने मन का भाव ऐसे शब्दों में कहे जिनका मतलब सुनने के साथ ही सुननेवाले की समझ में आ जाए तो ऐसा काव्य प्रसाद गुण से पूर्ण कहा जाता है। जिस तरह पके हुए अंगूर का रस बाहर से झलकता है, उसी तरह प्रसाद गुण परिप्लुत कविता का भावार्थ शब्दों के भीतर से झलकता है। उसके हृदयंगम होने में देर नहीं लगती। अतएव, जिस काव्य में करुणार्द्र संदेश और प्रेमातिशय द्योतक बातें हों, उस में प्रसाद गुण की कितनी आवश्यकता है, यह सहृदय जनों को बताना न पड़ेगा। प्यार की बात यदि कहते ही समझ में न आ गई- कारुणिक संदेश यदि कानों की राह से तत्काल ही हृदय में न घुस गया- तो उसे एक प्रकार निष्फल ही समझिये। प्रेमालाप के समय कोई कोश लेकर नहीं बैठता। करुण क्रंदन करने वाले अपनी उक्तियों में ध्वनि, व्यंग और क्लिष्टता नहीं लाने बैठते। वे तो सीधी तरह, सरल शब्दों में अपने जी की बात कहते हैं। यही समझकर महाकवि कालिदास ने 'मेघदूत' को प्रसाद गुण से ओत-प्रोत कर दिया है। यही सोचकर उन्होंने इस काव्य की रचना वैदर्भी रीति में की है- चुन-चुनकर सरल और कोमल शब्द रखे हैं; लम्बे-लम्बे समासों को पास तक नहीं फटकने दिया।"