“सिर पर बैठ्यो काग आँख दोउ खात निकारत।, खींचत जीभहिं स्यार अतिहि आनन्द उर धारत।।
गीध जाँघ को खोदि खोदि के मांस उपारत।, स्वान आंगुरिन काटि-काटि कै खात विदारत।।” काव्य पंक्ति में कौन सा रस है?
1
श्रृंगार रस
2
करूण रस
3
वीर रस
4
वीभत्स रस
5
वात्सल्य रस