निम्नलिखित गद्यांश को ध्यान से पढ़ें और इसके आधार पर पूछे गये प्रश्नों के उत्तर दें।
राजा राममोहन राय ने 1828 में ब्रह्म समाज की स्थापना की। अरबी फारसी का उन्हें गहरा ज्ञान था। इसी के माध्यम से वे अफलातून, अरस्तू आदि प्राचीन यूनानी विचारकों से परिचित हुए। कर्मकाण्ड और अंधविश्वास का विरोध करने के लिए उन्होंने उपनिषदों का उपयोग किया और मूर्ति पूजा को धर्म का बाहृााडम्बर माना। वे अंधश्रद्धा और रूढ़ियों के विरूद्ध लड़े। उनकी विचारधारा में तर्क की प्रधानता थी जो लॉक, ह्यूम और रुसो के अनुरूप थी। जाति-प्रथा को उन्होंने अमानवीय और राष्ट्रीयता-विरोधी कहा। उन्होंने सती प्रथा का विरोध किया तथा विधवा-विवाह और स्त्री-पुरुष के समानाधिकार का समर्थन किया और विशेष संदर्भ में पाश्चात्य संस्कृति को मूल्यवान समझा। इसीलिए उन्होंने अंग्रेज़ी शिक्षा-प्रणाली के प्रसार में योग दिया और ब्रिटिश राज्य की अच्छाइयों की प्रशंसा की। महादेव गोविंद रानाडे ने प्रार्थना समाज की स्थापना की। सामाजिक रूढ़ियों और अंधविश्वासों के विरुद्ध वे निरंतर संघर्ष करते रहे। उन्होंने धार्मिक और सामाजिक समस्याओं पर तर्कपूर्ण ढंग से विचार किया और भागवत-धर्म का अनुसरण करते हुए भी संकीर्ण विचारधारा को कभी भी प्रश्रय नहीं दिया। मध्यकालीन महाराष्ट्रीय संतों के प्रति गहरी आस्था के बावजूद वे प्रतिक्रियावादी नहीं थे न ही उनमें कोई पूर्वाग्रह था। रानाडे ने जिस एक सुधार पर सर्वाधिक बल दिया वह है - मनुष्य की समानता। वह जाति-पांति प्रथा के विरोधी थे और अंतर्जातीय विवाह के पक्षधर। स्त्री शिक्षा पर उन्होंने बल दिया है। वे पाश्चात्य विचारधारा से प्रभावित होने के बाद भी उसे बिना तर्क के स्वीकार नहीं करते थे दूसरे शब्दों में, वे भारतीय संस्कृति को नवीन वैज्ञानिक विचार-प्रणाली के अनुरूप ढालने का यत्न कर रहे थे।