वीर रस किस पंक्ति में है?
1
देखि रूप लोचन ललचाने। हरखे जनु निज निधि पहिचाने।।
थके नयन रघुपति-छवि देखी। पलकन हू परहरी निमेखी।।
थके नयन रघुपति-छवि देखी। पलकन हू परहरी निमेखी।।
2
तेहि समाज बैठे मुनि जाई। हृदय रूप-अहमिति अधिकाई।।
तहँ बैठे महेस-गन दोऊ! विप्र बेस गति लखइ न कोऊ।।
तहँ बैठे महेस-गन दोऊ! विप्र बेस गति लखइ न कोऊ।।
3
फिर पीटकर सिर और छाती अश्रु बरसाती हुई।
कुररी-सदृश सकरुण गिरा से दैन्य दरसाती हुई।।
4
मैं सत्य कहता हूँ सखे! सुकुमार मत जानो मुझे।, यमराज से भी युद्ध में प्रस्तुत सदा जानो मुझे।
हे सारथे! हैं द्रोण क्या? आवें स्वयं देवेन्द्र भी।, वे भी न जीतेंगे समर में आज क्या मुझसे कभी।।
हे सारथे! हैं द्रोण क्या? आवें स्वयं देवेन्द्र भी।, वे भी न जीतेंगे समर में आज क्या मुझसे कभी।।