उत्कट क्रोध से दुलारी के नथने फूले गए थे, अधर फड़क रहा था, आँखों से ज्वाला-सी निकल रही थी। फेंकू के गली में निकलते ही उसने दरवाज़ा बंद कर लिया। उधर पुलिस-रिपोर्टर से आँखें चार होते ही झेंपने के बावजूद लाचार-सा होकर फेंकू उसकी ओर बढ़ा और इधर धीरे-धीरे दुलारी आँगन में लौटी। आँगन में खड़ी उसकी संगनियों और पड़ोसिनों ने उसकी ओर कौतूहल-भरी दृष्टि से देखा, परन्तु दुलारी ने उनकी ओर आँख तक न उठाई। सीढ़ी चढ़कर उपेक्षा से झाड़ू अपनी कोठरी के द्वार पर फेंकती हुई वह अपनी कोठरी में जा घुसी। चूल्हे पर बटलोही में दाल चुर रही थी। उसने पैर की एक ठोकर से बटलोही उलट दी। सारी दाल चूल्हे में जा गिरी। आग बुझ गई। परन्तु दुलारी के दिल की आग अब भी भट्टी की तरह जल रही थी। पड़ोसिनों ने उसकी कोठरी में आकर वह आग बुझाने के लिए मीठे वचनों की जल-धारा गिराना आरम्भ किया। फलस्वरूप वह ठंडी भी होने लगी।
उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर नीचे पूछे गए प्रश्न का उत्तर बताइये: