निचे दिए गए गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए तथा पूछे गए प्रश्न के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प का चयन कीजिए।
कभी हमारे लिए बच्चन का अर्थ जी डबल ओ डी गुड होता था। जब पहली बार मैंने 1943 या 1944 में 'सरस्वती' के पुराने अंक पलटते हुए बच्चन जी की प्रसिद्ध कविता 'इस पार प्रिये ! मधु है, तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा' पढ़ी तो मेरा ध्यान कविता की ओर कम गया, कविता के शीर्ष पर प्रकाशित कवि के चित्र और उसके हस्ताक्षर पर ज्यादा एकाग्र हुआ। मैं उस समय सातवीं या आठवीं में रहा होऊँगा। कविता के ऊपर कवि का जो चित्र छपा था उसकी एक-एक बात मुझे इतने वर्षों के लंबे अंतराल के बाद भी बिलकुल साफ़-साफ़ याद है। कवि की केश - राशि का घटाटोप उसके घुँघराले, घोंसले से, बड़े-बड़े, खींचकर काढ़े गए बाल उसके चौड़े से माथे को और भी चौड़ा बना रहे थे । बाल इसके ज़रूरत से कुछ ज़्यादा ही बढ़े हुए थे और छतनार लग रहे थे। चेहरे पर चश्मा भी था - नैन नक्श बड़े साफ़ और सुपरिभाषित थे। मुख-मुद्रा बड़ी कोमल-कोमल सी थी। बेहद भावप्रवण चेहरे पर शायद एक मस्सा भी था। पर इस तस्वीर से भी ज्यादा ध्यानाकर्षक थे कवि के हस्ताक्षर जो गुड जैसे लगते थे।