निर्देश: निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर दिए गये प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
आज मानवीय जीवन की नैतिक शिक्षा का होना ही समाज सुधार की प्रथम सीढ़ी है। शिक्षाविदों के अनुसार विद्या दो प्रकार की होती है। प्रथम वह, जो हमें जीवन-यापन के लिए अर्जन करना सिखाती है और द्वितीय वह, जो हमें जीना सिखाती है। इनमें से एक का भी अभाव जीवन को निरर्थक बना देता है। पहली विद्या से विहीन व्यक्ति का जीवन दुःसाध्य हो जाता है। वर्तमान भारत में दूसरी विद्या का अभाव दिखाई देता है, परंतु पहली विद्या का रूप भी विकृत ही है, क्योंकि न तो स्कूल कॉलेजों में शिक्षा प्राप्त करके निकला छात्र जीविकार्जन के योग्य बन पाता है और न ही वह संस्कारों से युक्त हो पाता है, और न ही वे सुशिक्षित, सुसभ्य और सुसंस्कृत कहलाने का अधिकारी होता है।
जीवन के सर्वांगीण विकास को ध्यान में रखते हुए यदि शिक्षा के क्रमिक सोपानों पर विचार किया जाए, तो भारतीय विद्यार्थी को सर्वप्रथम इस प्रकार की शिक्षा दी जानी चाहिए जो आवश्यक हो, दूसरी जो उपयोगी हो और तीसरी जो हमारे जीवन को परिष्कृत एवं अलंकृत करती हो। वर्तमान भारत में शिक्षा की अवस्था देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन भारतीय दार्शनिकों ने अन्न से आनंद की ओर बढ़ने को जो विद्या का सार कहा था, वह सर्वथा समीचीन ही था।