निर्देश: नीचे दिए गए गद्यांश के बाद प्रश्न दिए गए हैं। इस गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़े और चार विकल्पों में से प्रत्येक प्रश्न का सर्वोत्तम उत्तर चुने -
आज जब भी कोई गाँव का नाम लेते हैं तो एक अलग ही छवि उभरती है। वह छवि कहती है कि वहाँ गरीबी है। वहाँ अशिक्षा और अज्ञान है। वहाँ अंध-विश्वास है। गंदगी है। बीमारी है। हमें विचार करना है कि सच क्या है? क्या हमारे गाँव ऐसे ही थे जैसे आज हैं? आज जो गांवों की दुर्दशा है उसके लिए जिम्मेदार कौन है? इन सवालों की पड़ताल करते हमें नई समझ बनानी है तथा गांवों के सही स्वरूप की पहचान करनी है। वैसे यह खुदा का शुक्र है कि गांवों पर कई तरह के आक्रामक दुष्प्रभावों के बावजूद उनका मूल स्वरूप नहीं बदला है। जो दूरस्थ गाँव हैं – शहर के पड़ोस से दूर उनकी निजता तो ख़ासी बची हुई है। ऐसी स्थिति मे हमारा दायित्व, एक शिक्षित समाज का दायित्व क्या बनता है? हमें विचार करना है। मगर ऐसा कोई भी विचार गांवों को आंखो से देखे बिना, स्वयं देख कर समझे बिना नहीं किया जा सकता। तो हमें अपनी फर्स्ट हैंड समझ बनाने के लिए गाँव चलना है। अपने मूल स्वरूप में गाँव एक वैद्यशाला है। एक विद्याशाला है। गाँव वैद्यशाला या प्रयोगशाला इसलिए है कि ज्ञान को रोज वहाँ कर्म की कसौटी पर कसा जाता है। आजमाया जाता है। जो ज्ञान कर्म की कसौटी पर खरा न उतरे तो उसे खारिज कर दिया जाता है, हर ज्ञान के होने की शर्त यह है वह सृजन और उत्पादन की शान पर तराशा जाए ।