निर्देश: निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
लोकतंत्र एक पूरी जीवन पद्धति है। लोकतंत्र हमारा भविष्य उस तरह नहीं है जिसे काल से विभाजित करके देखा जा सके। समय की निरन्तरता से अलग करके देखने में हमारे लोकतंत्र का ताना बाना उखड़ पुखड़ जाता है। यह वही स्वप्न है जिसे सर्वोदय और स्वराज्य के रूप में हमने देखा था। ग्रामोदय भी उसी का हिस्सा है। हम न चीन बनना चाहते हैं, न अमेरिका। दोनों देश ही पूरी तरह लोकतांत्रिक नहीं हैं। हम केवल आयात निर्यात की दरों को अपने लोकतंत्र की कसौटी नहीं बनाना चाहते। अपने गाँवों का आत्मविश्वास और उनकी आत्मनिर्भरता उससे अधिक महत्वपूर्ण है। उद्योग धन्धे और व्यापारी मण्डी अगर केवल मध्यवर्ग की संख्या बढ़ाती है और गरीबों की संख्या कम नहीं करती, ऐसा प्रबन्ध हमें नहीं चाहिए। हमारी शिक्षा पद्धति अपने आप में एक नए जातीय विभाजन का नमूना बन जाए और सामाजिक संतुलन को छिन्न भिन्न कर दे, ऐसी व्यवस्था हमारा स्वप्न नहीं है। जहाँ धर्मोन्मादी, गुरुगामी, पूजापाठी संस्कृति हमारे मंडी तंत्र का हिस्सा बन जाए, ऐसा धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र भी हमें नहीं चाहिए। अपनी भाषाओं की जीवनवाहिनी, आत्मोन्मुखी शक्ति को नकार कर आत्मविश्वास रहित सतही विदेशी अभिव्यक्तियों की मरुभूमि भी हमारे लोकतंत्र की सौंधी मिट्टी नहीं बन सकती। हमें अपना ही उजलापन चाहिए, चमक दमक नहीं। हमें शक्तिशाली गांव, सुरक्षित कस्बे-शहर, संतुलित मानसिकता, निष्पक्ष साधन संचयन-वितरण चाहिए। हम अपने अतिरिक्त कुछ और नहीं बनना चाहते। सिख, ईसाई, हिन्दू, मुस्लिम, पारसी, यहूदी, उत्तरी, दक्षिणी, पूर्वी, पश्चिमी प्रदेश मिलकर भारत बनता है, चीन, अमेरिका, यूरोप और रूस मिलकर भारत नहीं बनता। वे आर्थिक आकृतियाँ हैं, मानसिक मानचित्र नहीं।