Comprehension Passage

निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तरों के सही विकल्प चुनकर लिखिए।

शिशु में स्वावलंबन के भाव को जागृत करना अत्यंत आवश्यक है। पराश्रित रहने की आदत से व्यक्ति अपंग हो जाता है। जो स्वयं अपनी छोटी-मोटी आवश्यकताओं के लिए दूसरों पर आश्रित रहेगा, वह दूसरों के हित के लिए क्या कर सकेगा? स्वावलंबन का गुण शिशु में स्वतः ही नहीं आ जाता, इसके लिए सुनियोजित शिक्षा-पद्धति अपरिहार्य है। शिशु को यदि हम राष्ट्र की अमूल्य निधि के रूप में देखना चाहते हैं तो उसे एक ऐसा आदर्श वातावरण प्रदान करना पड़ेगा, जिसमें निर्बाध गति से उसका चहुँमुखी विकास हो सके। स्वच्छ, शांत, भयमुक्त और स्वास्थ्यप्रद वातावरण में ही शिशु की कोमल भावनाएं सुरिक्षत रह सकती हैं। शिशु की सुकोमल भावनाओं को आघात पहुंचाना सामाजिक अपराध है। राष्ट्र का यह पुनीत कर्तव्य है कि वह प्रत्येक बालक को ऐसा वातावरण उपलब्ध कराए कि उसमें हीन भावना न पनपने पाए। हीन भावना से ग्रसित शिशु बड़ा होने पर समाज के प्रति अपने कर्तव्य का सही रूप में निर्वाह नहीं कर सकता। यही उपयुक्त अवस्था है, जिसमें हम बच्चे को संकीर्णता से उबार सकते हैं। उसके अंदर से 'मेरे' और 'अपने' के भाव को हटाकर 'हमारा' और 'हमारी' के भाव पैदा करना जरूरी है। हमारी शिक्षा, हमारा गांव, हमारा समाज, हमारा देश आदि भाव जागने से सोचने-समझने और काम करने के दृष्टिकोण में व्यापकता आ जाएगी। इससे शिशु में आध्यात्मिक चेतना भी जागेगी, उसका नाता पूर्वजों से और देश की मिट्टी से भी जुड़ेगा और उसके अंत:करण का विकास होगा। इसी से शिशु घर का दीप और दुनिया का दिवाकर बनेगा। स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता दोनों का वास्तविक अर्थ एक ही है। वह अर्थ है अपना अवलंब अर्थात् आश्रय या सहारा आप बनना, किसी दूसरे पर बोझ न बनकर या निर्भर अर्थात् आश्रित न रहकर अपने-आप पर निर्भर या आश्रित रहना। इस प्रकार दोनों शब्द परावलंबन या पराश्रिता त्यागकर, स्वयं परिश्रम करके, सब प्रकार के दुख-कष्ट सहकर भी अपने पैरों पर खड़े रहने की शिक्षा और प्रेरणा देने वाले शब्द हैं। संसार में परावलंबी यानि दूसरों पर आश्रित होना या निर्भर रहना एक प्रकार का पाप, सर्वाधिक हीन कर्म और आदमी के अंत:बाह्य व्यक्तित्व को एकदम हीन तथा बौना बनाकर रख देने वाला हुआ करता है। पराश्रित या परावलंबी को हमेशा आश्रय, आधार देने वालों के अधीन बनकर रहना पड़ता है। उनके इशारों पर नाचने की बाध्यता और विवशता रहा करती है। उनकी अपनी इच्छा पहले तो होती ही नहीं, होने या रहने पर भी उसका कोई मूल्य और महत्व नहीं रहा करता। वह चाह कर भी उसके अनुसार न तो कार्य ही कर सकता है और न उसे कभी पूर्ण होते हुए ही देख सकता है। तनिक-सी इच्छा और बात के लिए उसे पराया मुंह देखना पड़ता है। अपना मन जान-बूझकर मारना पड़ता है। इसी कारण पराधीनता या परावलंबन को घोर पाप और निकृष्ट माना गया है। इसके विपरीत स्वाधीनता एवं स्वावलंबन को स्वर्ग का द्वार, पुण्य-कार्यों का परिणाम और सब प्रकार से श्रेष्ठ स्वीकार किया गया है।

राष्ट्र का पुनीत कर्तव्य क्या है?

1
बच्चे में हीन भावना पनपने देना
2
बच्चे की सुकोमल भावनाओं को संभालना
3
बच्चे की भावना को सुरक्षित न रखना
4
बच्चे को स्वस्थ और सबल वातावरण प्रदान करना

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