निम्नलिखित अनुच्छेद को ध्यानपूर्वक पढ़ें एवं नीचे दिए प्रश्नों के उत्तर दें।
एक पुरानी कहावत है कि ज्ञान ही शक्ति है | शिक्षा वह साधन है जो ज्ञान प्रदान करती है, अतः परोक्ष रूप से शिक्षा शक्ति को नियंत्रित करती है। यही कारण है कि सभ्यता की शुरुआत से हो सत्तारूढ़ व्यक्ति सदैव ही शिक्षा को नियंत्रित करने की चेष्टा करता रहा है | शिक्षा सत्तारूढ़ वर्ग के हाथ की कठपुतली रही है। ईसाई युग में ईसाईं धर्मगुरुओं ने शिक्षण संस्थाओं को नियंत्रित कर ईसाई धर्म सिद्धांतों को लोगों में फैलाया। ये धार्मिक सिद्धांत समाज की तत्कालीन व्यवस्था को बनाए रखने के साधन मात्र थे। यह धार्मिक शिक्षा गरीबों को दब्बू बने रहकर कड़ी मेहनत से जीविकापार्जन का उपदेश तो देती थी परन्तु धर्मपुरोहित तथा जमींदार विलासी जीवन व्यतीत करते थे तथा छोटी-छोटी बातों पर एक-दूसरे से लड़ा करते थे।
पुर्नजागरण काल में शिक्षा लगभग धर्मगुरुओं के हाथ से निकलकर राजकुमारों के हाथ में चली गई, या कहें कि शिक्षा ज्यादा धर्मनिरपेक्ष हो गयी | इसकी एक वजह राष्ट्र-राज्य तथा शक्तिशाली राजाओं का' उदय भी थी, जिन्होंने अपने शासन के तहत राष्ट्र को एकता के सूत्र में बांधा। इस प्रकार राजाओं के अधीन इस शिक्षा ने अपने सरपरस्तों के अमोघत्व को फैलाया। शिक्षा ने 'दिव्य शक्ति सिद्धांत' तथा 'राजा तो सभी गलत कर ही नहीं सकता' जैसे शानदार सिद्धांतों का प्रतिपादन तथा समर्थन किया।
औद्योगिक क्रांति के आरंभ के साथ शिक्षा का रुख फिर बदला तथा उसे खुश करने हेतु नये मालिक मिले। अब यह सिर्फ सामन्तवादी वर्ग की जागीर नहीं रह गयी बल्कि यह समाज के नए धनाढ्य व्यापारी वर्ग के लिए भी सुलभ हो गयी। बावजूद इसके शिक्षा कुछ अभिजात वर्ग तक ही सीमित थी। इस काल में हस्तक्षेप - रहित दर्शन प्रचलन में था जो राय के कार्य को सिर्फ कानून और व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित करता था, जबकि वास्तव में मुक्त प्रतिस्पर्धा एवं योग्यतम की उत्तरजीविता के रूप में जंगल का कानून व्याप्त था।