निर्देश: निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए व प्रश्नों के उत्तर दीजिये -
तरुणावस्था में ज्ञान की वृद्धि होती है और वृद्धावस्था में ज्ञान की परीक्षा। जिनका तारुण्य-काल विद्योपार्जन में नहीं व्यतीत हुआ अथवा जो यथेष्ट ज्ञान अर्जित नहीं कर सके उनके लिए वृद्धकाल में इस अभाव की पूर्ति संभव नहीं है। मैं स्वयं विद्या के क्षेत्र में बी.ए. के आगे नहीं बढ़ सका और मेरे कितने ही छात्र विद्या की चरमकोटि तक पहुँच गए हैं। उनकी असाधारण विद्या और अपूर्व प्रतिष्ठा देखकर उनके समवयस्क लोगों में भले ही कुछ ईर्ष्या का भाव हो, पर वृद्ध को यह भाव हो नहीं सकता। अधिकांश की तो यह धारणा रहती है कि यदि वे चाहते तो सब कुछ स्वायत्त कर सकते थे। परंतु उन्होंने इच्छा नहीं की। इसके अतिरिक्त उन्हें संसार का जो अनुभव हो चुका है उसे वे प्रेमचंदजी के 'बड़े भाई साहब' की तरह विद्या की अपेक्षा अधिक गौरव देंगे। ज्ञान के क्षेत्र में अजेय ही रहेंगे। मेरे नगर के कुछ वयोवृद्ध जन न तो उच्च शिक्षा प्राप्त कर सके और न खैरागढ़ के बाहर का ही कुछ विशेष अनुभव प्राप्त कर सके हैं। उनके ज्ञान और अनुभव दोनों सीमा-बद्ध होने पर वे केवल अवस्था के कारण एक गौरव प्राप्त कर चुके हैं।