निर्देश- निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर, दिए गए प्रश्नों के सही उत्तर दीजिए।
मनीषी कहते हैं, पुरुषार्थी अपने भाग्य का निर्माण स्वयं करते हैं। केवल आलसी अपने भाग्य को कोसते हैं। पुरुषार्थी, आलस्यरहित रहना ठीक समझता है। साधारणतया जिसे हम भाग्य या प्रारब्ध कहते हैं, वह हमारे पूर्व संचित कर्म ही होते हैं। श्रेष्ठ पुरुष दौड़ लगाते हैं, आगे चलते हैं, उनके पीछे और लोग चलते हैं। जो दौड़ता है उसे लक्ष्य मिलने की संभावना अधिक होती है। महाराज भर्तृहरि ने मनुष्यों को तीन श्रेणियों में बाँट दिया था - अधम, मध्यम और उत्तम। अधम क्लेश के डर से कोई काम प्रारम्भ नहीं करते। मध्यम लोग कार्य प्रारम्भ कर तो देते हैं, परन्तु कोई विघ्न पड़ने पर दुःखी होकर बीच में ही छोड़ देते हैं। परन्तु उत्तम लोग बार-बार कष्ट, विघ्न आने पर भी प्रारम्भ किए गए काम को नहीं छोड़ते वरन् उसे पूरा करके ही दम लेते हैं । ऐसे लोग पुरुषार्थी कहलाते हैं। उपनिषद् कहते हैं - चरैवेति-चरैवेति अर्थात् चलते रहो, चलते रहो। जो हमारा समय निकल गया उसकी चिंता छोड़ें। जो जीवन शेष बचा है उसके बारे में विचार करें।