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अपने कार्य को आप ही करना स्वावलंबन कहलाता है। बालक जब से होश संभालता है, अपने निजी कार्य स्वयं करने लगता है। इसी प्रकार यदि मनुष्य जीवन की किसी भी स्थिति में अपना कार्य स्वयं करे, तो वह स्वावलंबी कहलाता है। स्वावलंबी होना नागरिकता का महान गुण है। स्वावलंबन बड़प्पन का गुण है। कहते हैं कि एक दिन प्रसिद्ध विद्वान् ईश्वरचंद्र विद्यासागर रेलवे स्टेशन के बाहर खड़े थे। तभी भीतर से एक व्यक्ति हाथ में एक छोटा सा बक्सा लिए उनके पास आया। उन्हें साधारण वेश में देखकर भूल से कुली समझ बैठा और बोला, “मेरा सामान ले चलोगे? ” ईश्वरचंद्र बिना कुछ बोले उसका सामान उठाकर चल दिए। लक्ष्य पर पहुंचकर जब वह उन्हें मजदूरी देने लगा तो वे बोले, “ मजदूरी नहीं चाहिए। तुम अपना काम स्वयं नहीं कर सकते, इसलिए मैंने तुम्हारी सहायता कर दी है।” व्यक्ति लज्जित हुआ। जब उसे यह पता चला कि उनका कुली बंगाल का प्रसिद्ध विद्वान् है तो वह उनके पाँव में गिर पड़ा। उसने अपना कार्य आप करने की सौगंध ली